करौली। करौली जिले की सादौली ग्राम पंचायत के गुडला गांव में इस बार पंचायत चुनाव के दौरान सामाजिक एकता की एक अनूठी तस्वीर देखने को मिली है। जब सरपंच पद अनुसूचित जनजाति वर्ग के लिए आरक्षित हुआ, तो गांव के सामने एक नया राजनीतिक समीकरण बनाने की चुनौती थी। लंबे समय से गुर्जर समाज का प्रतिनिधित्व रहने के कारण, ग्रामीणों ने आपसी सहमति से एक ऐसी रणनीति अपनाई जिसने पूरे जिले में सुर्खियां बटोर ली हैं। गुर्जर और धानका समाज ने एकजुट होकर नैना धानका को अपना उम्मीदवार बनाया और उनके समर्थन में पूरी ताकत झोंक दी।
इस निर्णय के पीछे की कहानी गांव में हुई एक महत्वपूर्ण बैठक से शुरू हुई। राहुल गुर्जर और नैना धानका के विवाह के बाद, ग्रामीणों ने नैना को चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया, क्योंकि वह अनुसूचित जनजाति समुदाय से आती हैं। चुनाव प्रचार के दौरान दोनों समाजों के लोगों ने घर-घर जाकर संपर्क किया और विकास के एजेंडे पर लोगों से मतदान की अपील की। इस दौरान सामाजिक सौहार्द और गांव के सर्वांगीण विकास को ही मुख्य मुद्दा बनाया गया, जिससे चुनावी मुकाबला एकतरफा हो गया।
चुनाव परिणाम आने पर नैना धानका की जीत का अंतर काफी बड़ा रहा। कुल 11 उम्मीदवारों के बीच, नैना ने 2,107 वोट हासिल किए, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी हरिओम मीणा को केवल 243 वोट मिले। इस प्रकार, उन्होंने 1,864 मतों के भारी अंतर से जीत दर्ज की। जीत की घोषणा के बाद गांव में जश्न का माहौल था और समर्थकों ने जुलूस निकालकर अपनी खुशी का इजहार किया।
नैना धानका एक युवा और शिक्षित महिला हैं, जिनसे ग्रामीणों को विकास की काफी उम्मीदें हैं। यह चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि आरक्षित सीट होने के बावजूद ग्रामीणों ने आपसी सहमति से उम्मीदवार तय किया। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नैना धानका अपनी नई जिम्मेदारी को किस तरह निभाती हैं। फिलहाल, गुडला गांव का यह चुनाव पंचायत स्तर पर आरक्षण और ग्रामीण राजनीति के बदलते स्वरूप को समझने के लिए एक बड़ा उदाहरण बन गया है।


