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Success Story : मुंबई से आई बहू ने राजस्थान के रेगिस्तान में बोए हौसले, 50 एकड़ में उगा रही सफलता की फसल

Success Story : मुंबई से आई बहू ने राजस्थान के रेगिस्तान में बोए हौसले, 50 एकड़ में उगा रही सफलता की फसल

राजस्थान के बाडमेर में मुंबई से आई एक बहू ने रेगिस्तान में हौसला बो दिया। रेगिस्तान की तपती रेत्त, भीषण गर्मी और पानी का संकट। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में मुंबई में पली-बढ़ी एक महिला ने खेती-किसानी को आसान बना दिया। नयना जांगिड़ नवाचार, जैविक खाद और जल संरक्षण के मॉडल को अपनाकर खेती में सफलता की नई इबारत लिख रही है।

मुंबई जैसे महानगर में पली-बढ़ीं नवना जांगिड़ वर्ष 2003 में जब शादी के बाद बाड़मेर आई तो जीवन की राह भी बदल गई। शुरुआती वर्षों में गृहिणी के रूप में परिवार की जिम्मेदारियां निभाई, लेकिन पेड़-पौधों और प्रकृति के प्रति उनका लगाव हमेशा बना रहा। परिवार का सहयोग मिला तो इस रुचि को खेती में बदलने का फैसला किया।

आज वे करीब 50 एकड़ क्षेत्र में खेती का प्रबंधन कर रही है। इनमें 25 एकड़ में अनार की खेती है। उनकी पहचान सिर्फ एक सफल महिला किसान के रूप में नहीं, बल्कि खेती को पर्यावरण संरक्षण और महिला रोजगार से जोड़ने वाली उद्यमी के रूप में भी बन रही है। करीब छह साल पहले अनार की खेती शुरू की थी।

वर्तमान में उनके खेत में अनार के करीब एक हजार पौधे हैं। इनसे सालाना करीब 12 से 15 टन अनार का उत्पादन होता है। अनार के अलावा वे बाजरा, मूंगफली, जौरा, मूंग, लहसुन, प्याज और अन्य मौसमी फसले भी उगाती है। खेती में वे आसपास के गांवों की महिलाओं को काम दे रही है। महिलाएं ही अनार की खेती से जुड़े काम संभाली हैं। इससे उन महिलाओं को भी रोजगार मिल रहा है।

खेत में रसायनों की जगह गोबर और केंचुआ खाद

नयना खेती में जैविक तरीकों को प्राथमिकता देती हैं। गौशाला से मिलने वाले गोबर का उपयोग खाद के रूप में किया जाता है। कृषि विज्ञान केंद्र से केंचुए प्राप्त कर खेत में ही वर्मी कम्पोस्ट तैयार किया जाता है। पेड़-पौधों से गिरने वाली पत्तियों और जैविक कचरे को जलाने के बजाय उन्होंने अलग डीकंपोज एरिया बनाया है। इसमें पत्तियों के साथ गोबर, मिट्टी, गुड़ और पानी डालकर प्राकृतिक तरीके से खाद तैयार की जाती है। इससे खेत की मिट्टी को पोषक तत्व मिलते हैं और कचरा जलाने से होने वाले प्रदूषण से भी बचाव होता है।

नीम के पेड़ बने प्राकृतिक सुरक्षा कवच

बाड़मेर की भीषण गर्मी, लू और सर्द हवाओं के बीच खेती करना आसान नहीं है। इसलिए फार्म के चारों ओर करीब 100 नीम के पेड लगाए हैं। अब ये पेड़ धने हो चुके हैं और खेत के चारों ओर प्राकृतिक हरित घेरा तैयार हो गया है। इससे तेज गर्मी के दौरान खेत के आसपास तापमान कम रखने में मदद मिलती है। नीम की पत्तियां भी खाद के रूप में उपयोगी साबित होती हैं। इसके अलावा फार्म में चीकू, आंवला, गोंदा, बेर, बोडी, सांगरी, कुम्हट और जामुन सहित कई देशी प्रजातियों के पेड़-पौधे लगाए हैं।

बारिश की हर बूंद जमीन में उतारने की व्यवस्था

मरुस्थलीय बाडमेर में पानी की अहमियत को समझते हुए नयना ने फार्म की जमीन की ढलान इस तरह रखी है कि बारिश का पानी बेकार बहकर बाहर निकलने के बजाय जमीन में समा सके। वाटर हार्वेस्टिंग से भूजल स्तर और ट्यूबवेल के रिचार्ज में मदद मिलती है। वे आसपास के लोगों को भी वर्षा जल संरक्षण और पानी को जमीन में उतारने के उपायों के बारे में जागरूक करती हैं।

हिरण-मोर, सांप जंगल में छोड़े

प्राकृतिक वातावरण में यहां पक्षियों और वन्यजीवों की भी मौजूदगी रहती है। इस वर्ष उनके फार्म पर करीब 10 हिरण, दो मोर और 41 सांप मिले। वन विभाग की मदद से इन वन्यजीवों को सुरक्षित रूप से जंगल क्षेत्र में छोड़ा गया।

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