आयुर्वेदिक का भारतीय इतिहास का पुराना नाता है। आयुर्वेदिक इलाज करने वाले वैधों की देश ही नहीं विदेशों तक धमक रही है और इन आयुर्वेदिक वैध से ही अंग्रेज भी इलाज लेते थे। एलोपैथिक, होम्योपैथिक दवाओं से वाकिफ होने के बावजूद अंग्रेजों का आयुर्वेदिक औषधि पर कितना भरोसा था इसके आज भी दस्तावेजी प्रमाण वैद्य परिवार के पास मौजूद हैं। अजमेर के जाने माने वैद्य रहे जगन्नाथ शर्मा ने उस दौर में अंग्रेजों की नब्ज टटोली और आयुर्वेदिक नुस्खे से दवा बनाकर उनका मर्ज दूर किया। अंग्रेज मरीजों का भरोसा इतना था कि इंग्लैण्ड जाने के बाद भी वे भारत से दवा मंगवाते थे।
जानकारी अनुसार वैद्य जगन्नाथ शर्मा अजमेर के प्रसिद्ध वैद्य थे। राजपरिवारों में उनकी अच्छी पैठ थी। वे अक्सर देवगढ़, शाहपुरा, पीसांगन, शिवदासपुरा ठिकानों के यहां राजपरिवारों के सदस्यों को देखने जाया करते थे। राजपरिवारों के यहां अंग्रेज अफसर भी खूब आया करते थे। ऐसे में अंग्रेज अफसरों से भी मुलाकात होती थी। आजादी के पहले अजमेर अंग्रेजी हुकूमत का गढ़ रहा।
यहां बड़ी संख्या में अंग्रेज अफसर रहा करते थे। बीमार होने पर वह भी वैद्य जगन्नाथ शर्मा से जांच करवाते और उनकी दवाईयां लेते थे। ऐसे में अंग्रेजों के बीच उनका नाम हो गया। स्वर्ण भस्म, लोह भस्म, रस माणिक्य से तैयार किए उनके नुस्खे बहुत सटीक बैठते थे। रोगप्रतिरोधकता, हृदय रोग और त्वचा, पीलिया, दमे और त्वचा सहित अन्य कुछ रोगों में उनकी अच्छी जाता था।
सटीक उपचार के कारण अंग्रेज इंग्लैण्ड जाकर भी उनकी दवाईयां मंगवाते थे। ऐसे में वहां से पाउण्ड में रकम आती थी। दवाईयों की एवज में किए ऐसे ही एक भुगतान का पत्र आज भी उनके पास मौजूद पकड़ थी। खुद बनाते थे दवाईयां उनके परिवार के प्रद्युमन त्रिपाठी ने बताया कि वैद्य जगन्नाथ खुद ही दवाईयां बनाते थे। घर में एक कमरा रसायनशाला की तरह काम में लिया
है। यूनाइटेड किंगडम मर्केंटाइल एण्ड फायनेंस कॉरपोरेशन लिमिटेड के इस पत्र में 36 पाउण्ड की रसीद है। जो लंदन से आए थे। यह रकम 30 जुलाई 1937 को द इंपिरियल बैंक अजमेर के जरिए वैद्यजी को मिली थी। त्रिपाठी ने बताया कि उनकी दादी कलावती देवी अक्सर इस पर चर्चा करती थी। यह पत्र उन्हीं बातों को सत्यापित करता है। परिवार में आज भी धनवंतरी जयंती के दिन पारंपरिक तरीके से पूजा की जाती है।
इन रोगों में आती है काम
स्वर्ण भस्म रोग प्रतिरोधकता, हृदयरोग और त्वचा में ओज बनाए रखने और उम्र के प्रभाव को धीमा करने के काम आती है। रस माणिक्य से त्वचा रोग, कुष्ठ रोग, फोड़े-फुंसियों, श्वसन तंत्र के रोग में बड़ा लाभ देती थी। शरीर में बढ़े हुए वात और कफ दोष को संतुलित करती है।


