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Rajasthan Milk Rates : राजस्थान में दूध बेचकर भी घाटे में गोपालक, 42 रुपए लीटर में नहीं निकल रही लागत, बढ़ाने लगे दाम की मांग

Rajasthan Milk Rates : राजस्थान में दूध बेचकर भी घाटे में गोपालक, 42 रुपए लीटर में नहीं निकल रही लागत, बढ़ाने लगे दाम की मांग

राजस्थान के शहरों में सुबह साढ़े पांच बजे तक घरों में दूध पहुंचाने वाले गोपालकों के लिए अब पशुपालन घाटे का सौदा बनता जा रहा है। पशुओं को खिलाने से लेकर उनके इलाज और सप्लाई तक हर स्तर पर खर्च बढ़ गया है, लेकिन दूध के खरीद मूल्य में उस अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हुई। हालात यह है कि 42 रुपए लीटर दूध बेचने के बावजूद गोपालकों को लागत तक निकालना मुश्किल हो रहा है। पशु आहार, सूखा चारा और सरसों के तेल की कीमतों में उछाल ने कमर तोड़ दी है।

दूसरी ओर उत्पादकों से 42 रुपए लीटर खरीदा जाने वाला दूध बाजार में 50 से 55 रुपए तक बिक रहा है। ऐसे में गोपालक अब दूध के दाम बढ़ाने के साथ मिलावटी दूध के कारोबार पर कार्रवाई की मांग उठा रहे है। उदयपुर जिले में करीब छह लाख दूधारू गाये है। शहर में गाय के दूध पर निर्भर करीब पांच हजार लोग है और 1000 से 1500 तक डेयरियां संचालित हो रही है। शहर में रोजाना करीब एक लाख लीटर दूध की आवक बताई जा रही है। इसके बावजूद दूध उत्पादन करने वाले किसानों को उनकी लागत के अनुरूप दाम नहीं मिल रहे हैं।

सरस और निजी डेयरियों के भाव में बड़ा अंतर

दूध के खरीद मूल्य में भी अंतर गोपालकों को सरस की बजाय निजी डेयरियों की ओर जाने को मजबूर कर रहा है। उत्पादकों के अनुसार गाय के दूध में 3.5 फैट होने पर सरस डेयरी करीब 32 रुपए प्रति लीटर देती है, जबकि निजी डेयरियां 40 से 42 रुपए तक खरीद रही है। इस कारण उत्पादक सरस को दूध देने के बजाय निजी डेयरियों और सप्लायर्स को दूध दे रहे हैं। हालांकि निजी डेयरियों में 42 रुपए लीटर बेचने पर भी किसानों का खर्च नहीं निकल रहा। सप्लाई में लगे वाहनों के पेट्रोल का खर्च भी लगातार बढ़ रहा है।

बाजार में 50 से 55 रुपए में बिक्री

उत्पादकों का कहना है कि दूध के अंतिम उपभोक्ता से मिलने वाली कीमत और किसान को मिलने वाले दाम के बीच 8 से 13 रुपए तक का अंतर है। किसान 42 रुपए लीटर दूध देता है, जबकि बाजार में यही दूध 50 से 55 रुपए तक बिकता है। इस अंतर का लाभ उत्पादक तक नहीं पहुंच रहा। छोटे गोपालकों के लिए समितियों की व्यवस्था में थोक स्तर पर दूध देना भी आसान नहीं है। दुग्ध उत्पादक किशन वागावत ने बताया कि कई लोग घरेलू जरूरत के लिए गाय पालते हैं और बचा हुआ दूध स्थानीय डेयरी या सप्लायर को देते हैं। किसी के यहां सप्लायर की गाड़ी आती है तो कोई खुद दूध पहुंचाता है।

पशु आहार का कट्टा 500 रुपए महंगा

गोपालकों के सामने बड़ी चुनौती पशुओं के चारे और आहार की बढ़ती कीमतें हैं। डेढ़ माह पहले पशु आहार का कहा 3300 रुपए में मिलता था, जो अब बढ़कर 3800 रुपए के आसपास पहुंच गया है। सूखे चारे की कीमत भी दो से तीन माह में 6 से 8 रुपए किलो से बढ़कर 13 रुपए किलो हो गई है। बारिश नहीं होने से चारे की उपलब्धता और कीमतों में जल्द राहत मिलने की उम्मीद भी कम है। गायों को दिए जाने वाले सरसों के तेल का पीपा भी 2500 रुपए से बढ़कर 3300 से 3500 रुपए तक पहुंच गया है। पशुओं के बीमार होने पर दवाइयों और चिकित्सक का खर्च अलग है।

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