Bollywood Film News : बालीवुड की पुरानी फिल्मों का असर दर्शकों पर सीधा देखा जाता था। उस जमाने में आई देशभक्ति व आस्था से जुड़ी हुई फिल्मों का असर लोगों पर दिखाई देता था। जहां लोगों की भावनाओं पर इनका असर दिखाई देता था, वहीं फिल्म व गानों में पहले कपड़े व बालों का स्टाइल तक लोग अपना लेते थे।
ऐसी ही एक धार्मिक फिल्म ने देश के सिनेमाघरों को मंदिर बना दिया था। जहां पर फिल्म देने से पहले लोग सिनेमारघर के बाहर ही जूते चप्पल उतार देते थे। यह लोकप्रिय फिल्म वर्ष 1975 में रिलीज हुई फिल्म 'जय संतोषी मां' का है। विजय शर्मा के निर्देशन में बनी इस फिल्म ने उस दौर में ऐसी लोकप्रियता हासिल की कि सिनेमाघरों में फिल्म देखने का अनुभव कई दर्शकों के लिए धार्मिक आयोजन जैसा बन गया था।
आस्था से जुड़ी एक कहानी
फिल्म में कनन कौशल ने सत्यवती और अनीता गुहा ने संतोषी मां की भूमिका निभाई थी। आशीष कुमार और भारत भूषण भी अहम भूमिकाओं में नजर आए। कहानी सत्यवती की भक्ति और उसके जीवन में आने वाली कठिनाइयों के इर्द-गिर्द घूमती है। फिल्म की खासियत यह थी कि इसकी कहानी में भक्ति को एक आम महिला के जीवन से जोड़ा गया। सत्यवती की परेशानियां और उनसे जूझने के उसके तरीके से दर्शकों जुड़ गए।
हाथ जोड़कर खड़े हो जाते थे दर्शक
यह फिल्म लोगों की धार्मिक भावना से जुड़ गई थी। कई दर्शक सिनेमाघरों में प्रवेश से पहले जूते-चप्पल उतार देते थे। पर्दे पर संतोषी मां के दिखाई देने पर हाथ जोड़कर प्रणाम करने और फूल चढ़ाने जैसी घटनाओं का भी उल्लेख मिलता है। इस तरह कुछ जगहों पर सिनेमाघर अस्थायी रूप से मंदिर जैसे माहौल में बदल गए थे।
यह फिल्म की सफलता का असाधारण उदाहरण था। उस दौर में बड़े सितारों और भव्य प्रचार के बिना बनी इस धार्मिक फिल्म ने दर्शकों के बीच अपनी अलग जगह बनाई। इसकी लोकप्रियता ने दिखाया कि किसी कहानी का लोगों की आस्था और भावनाओं से जुड़ना भी उसे व्यापक पहचान दिला सकता है।
गीतों ने बना दिया था फिल्म को सुपरहिट
फिल्म के संगीतकार सी अर्जुन और गीतकार कवि प्रदीप ने इसके भक्ति गीतों को यादगार बनाया। उषा मंगेशकर की आवाज में मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की' गीत खास तौर पर लोकप्रिय हुआ। फिल्म के अन्य गीतों ने भी दर्शकों के बीच अपनी पहचान बनाई। सरल शब्दों और सहज धुनों के कारण ये गीत भक्ति संगीत का हिस्सा बन गए।


