करौली। लोकतंत्र के महापर्व के बीच करौली जिले के टोडूपुरा स्थित मतदान केंद्र संख्या 32 पर एक अलग ही नजारा देखने को मिला। यहां रीठौली गांव के चार वार्डों के 1388 पंजीकृत मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग करने से पूरी तरह परहेज किया। यह बहिष्कार कोई नई घटना नहीं है, बल्कि यह पिछले तीन दशकों से चली आ रही एक लंबी नाराजगी का परिणाम है, जो हर चुनाव के साथ फिर से उभर कर सामने आती है।
ग्रामीणों की मुख्य मांग गांव को एक स्वतंत्र ग्राम पंचायत का दर्जा दिलाने और गांव की सीमा के भीतर ही मतदान केंद्र स्थापित करने की है। वार्ड संख्या 3, 4, 5 और 6 के निवासियों का कहना है कि उनकी यह बुनियादी प्रशासनिक मांग वर्षों से अनसुनी की जा रही है। इसी उपेक्षा के विरोध में उन्होंने एक बार फिर चुनाव प्रक्रिया से दूरी बनाए रखने का निर्णय लिया है।
इस बहिष्कार का असर मतदान केंद्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई दिया, जहां दिन भर सन्नाटा पसरा रहा। आंकड़ों के अनुसार, वार्ड संख्या 3 में 331 मतदाता हैं, जबकि वार्ड 4, 5 और 6 में कुल 1057 मतदाता पंजीकृत हैं। इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं का मतदान प्रक्रिया में शामिल न होना स्थानीय प्रशासन के लिए एक गंभीर चुनौती और चर्चा का विषय बना हुआ है।
ग्रामीणों का कहना है कि वे लगभग 25 से 30 वर्षों से इसी तरह अपनी मांगों को लेकर विरोध दर्ज कराते आ रहे हैं। हर बार चुनाव के दौरान यह मुद्दा उठता है, लेकिन समाधान न मिलने के कारण ग्रामीणों का आक्रोश कम होने के बजाय बढ़ता ही जा रहा है। लोकतंत्र में मतदान को सबसे सशक्त माध्यम माना जाता है, लेकिन अपनी प्रशासनिक जरूरतों के लिए इतने लंबे समय तक बहिष्कार का रास्ता चुनना व्यवस्था पर बड़े सवाल खड़े करता है।
यह स्थिति स्पष्ट करती है कि स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक और सामुदायिक संवाद में एक बड़ी खाई बनी हुई है। जब तक ग्रामीणों की इन बुनियादी मांगों पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक यह गतिरोध जारी रहने की संभावना है। चुनाव के दौरान एक भी वोट न पड़ना न केवल ग्रामीणों की दृढ़ता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि वे अपनी मांग को लेकर किसी भी समझौते के मूड में नहीं हैं।
