अवैध खनन व अवैध क्रशर कार्रवाई की जद से बाहर क्यों? -सिर्फ वैध इकाइयों पर ही लागू होते हैं प्रदूषण नियंत्रण कानून!
बिजौलियां(निस)। खनन, क्रशर और खनिज प्रसंस्करण गतिविधियाँ यदि नियमानुसार संचालित न हों तो पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन जाती हैं। आमतौर पर यह देखा जाता है कि प्रदूषण नियंत्रण विभाग की ओर से ज़्यादातर वैध खदानों, वैध क्रशर और पंजीकृत प्रसंस्करण इकाइयों पर ही कार्रवाई की जाती है। इसके विपरित नियम-कायदों को दरकिनार कर संचालित किए जा रहे अवैध खनन और अवैध क्रशर पर कार्रवाई की जहमत नहीं उठाई जाती हैं। इससे सवाल उठना लाज़मी हैं कि प्रदूषण से जुड़े कानून अवैध खनन पर लागू क्यों नहीं होते हैं? अवैध खनन और अवैध क्रशर प्रायः बिना किसी पर्यावरणीय स्वीकृति, तकनीकी मानकों और प्रदूषण नियंत्रण उपायों के संचालित होते हैं। इनके कारण हवा में अत्यधिक धूल फैलती है, जल स्रोतों में मिट्टी और अपशिष्ट पहुँचता है, कृषि भूमि नष्ट होती है और आसपास के लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है। कई मामलों में यह प्रदूषण वैध खनन की तुलना में कहीं अधिक गंभीर होता है, क्योंकि यहाँ किसी प्रकार की निगरानी या नियंत्रण व्यवस्था मौजूद नहीं होती हैं। खनिज मामलों के जानकार रामप्रसाद विजयवर्गीय बताते हैं कि पर्यावरण संरक्षण से जुड़े कानून वैध और अवैध दोनों प्रकार की गतिविधियों पर समान रूप से लागू होते हैं।एयर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्युशन ) एक्ट 1981 वायु प्रदूषण फैलाने वाली हर गतिविधि पर लागू होता है। वहीं वाटर (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल ऑफ पॉल्युशन ) एक्ट, 1974 जल स्रोतों को प्रदूषित करने पर रोक लगाता है। एनवायरनमेंट (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1986 के अंतर्गत बिना अनुमति कोई भी खनन या औद्योगिक गतिविधि चलाना सीधा अपराध है। अर्थात् किसी इकाई का अवैध होना उसे कानून से मुक्त नहीं करता, बल्कि यह स्थिति उसे और अधिक दंडनीय बनाती है। इसके बाद भी कार्रवाई में असमानता होना सम्बंधित विभागों की लापरवाही या यूं कहें मिलीभगत को दर्शाती हैं ?व्यवहारिक स्तर पर कई बार यह तर्क दिया जाता है कि अवैध खनन खनिज विभाग या पुलिस का विषय हैं, प्रदूषण नियंत्रण विभाग का नहीं। कुछ मामलों में अवैध इकाइयों के पास कोई पंजीकरण या स्थायी रिकॉर्ड न होने का बहाना भी बनाया जाता है। इसके अतिरिक्त, विभागों के बीच समन्वय की कमी और स्थानीय स्तर पर प्रभाव या दबाव भी कार्रवाई को प्रभावित करता है।
हालाँकि, ये सभी कारण कानून और पर्यावरण संरक्षण की भावना के अनुरूप नहीं हैं।
पर्यावरण की रक्षा तभी संभव है जब वैध और अवैध दोनों प्रकार की प्रदूषणकारी गतिविधियों पर समान और सख्त कार्रवाई हो। इसके लिए खनन विभाग, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और पुलिस की ओर से संयुक्त कार्रवाई आवश्यक है। अवैध खनन पर केवल आर्थिक नुकसान का ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय क्षति का आकलन कर दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए।
यह स्पष्ट है कि अवैध खनन और अवैध क्रशर से भी पर्यावरण को गंभीर नुकसान होता है और प्रदूषण से जुड़े सभी कानून इन पर पूरी तरह लागू होते हैं। केवल वैध इकाइयों पर कार्रवाई करना न तो न्यायसंगत है और न ही पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य को पूरा करता हैं।जब तक अवैध खनन पर प्रभावी और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होगी तब तक सरकारों के स्वच्छ पर्यावरण के प्रयास अधूरे रहेंगे।पर्यावरण की रक्षा सिर्फ कानून बनाने से नहीं, उसके निष्पक्ष पालन से ही सम्भव हैं।
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