ग्रीन बेल्ट में आवासीय पट्टे जारी करने वाले अधिकारियों पर गिरेगी गाज, हाईकोर्ट ने दिए जांच के आदेश
राजस्थान हाईकोर्ट ने मास्टर प्लान में ग्रीन बेल्ट के रूप में चिन्हित भूमि पर आवासीय पट्टे जारी करने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए विभागीय जांच के आदेश दिए हैं।

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने शहरी मास्टर प्लान में हरित पट्टी के लिए आरक्षित भूमि पर आवासीय पट्टे जारी करने के मामले में प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के निर्देश दिए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि मास्टर प्लान केवल एक नीतिगत दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक वैधानिक बाध्यता है जिसका पालन करना सभी स्थानीय निकायों के लिए अनिवार्य है। कोर्ट ने ग्रीन बेल्ट की जमीन पर दिए गए आवासीय पट्टे को निरस्त करने के निर्णय को सही ठहराते हुए, इसे जारी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ विभागीय जांच शुरू करने और तीन महीने के भीतर कार्रवाई रिपोर्ट पेश करने का आदेश दिया है।
न्यायालय ने गुलाब कोठारी बनाम राजस्थान सरकार मामले का उल्लेख करते हुए कहा कि किसी भी शहर के लिए ग्रीन बेल्ट उसकी पर्यावरणीय संपत्ति है, जिसे संरक्षित करना प्रशासन का प्राथमिक दायित्व है। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई पट्टा कानून के प्रावधानों का उल्लंघन करके जारी किया गया है, तो उसे संवैधानिक संरक्षण का दावा करने का अधिकार नहीं है। अधिकारियों द्वारा मास्टर प्लान के नियमों को दरकिनार करना न केवल कर्तव्य की अवहेलना है, बल्कि यह शहरी नियोजन कानूनों के प्रति जनता के विश्वास को भी कमजोर करता है।
इस मामले में याचिकाकर्ता ने अलवर नगर निगम द्वारा पट्टा निरस्त करने की कार्रवाई को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि उसने सभी राजस्व अभिलेखों की जांच के बाद ही जमीन खरीदी थी और वह एक निष्पक्ष खरीदार है। इसके विपरीत, राज्य सरकार और नगर निगम ने तर्क दिया कि मास्टर प्लान-2031 में उक्त भूमि ग्रीन बेल्ट के रूप में दर्ज है, इसलिए वहां किसी भी प्रकार का आवासीय उपयोग या नियमन कानून के विरुद्ध है। नगर पालिका अधिनियम के तहत गलत तथ्यों के आधार पर जारी पट्टों को रद्द करने का अधिकार निकाय के पास सुरक्षित है।
कोर्ट ने अपने आदेश में प्रमुख स्वायत्त शासन सचिव और कार्मिक सचिव को निर्देश दिए हैं कि वे पट्टा जारी करने की प्रक्रिया में शामिल सभी अधिकारियों की पहचान करें। अदालत ने कहा कि इन अधिकारियों ने रिकॉर्ड के संरक्षक होने के बावजूद जानबूझकर नियमों की अनदेखी की, जो कानूनी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है। यह मामला शहरी विकास कानूनों की नींव पर प्रहार करने जैसा है, इसलिए दोषी अधिकारियों के खिलाफ सख्त विभागीय कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए ताकि भविष्य में ऐसी अनियमितताओं पर रोक लग सके।
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