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मानसून की विदाई का प्राकृतिक संकेत: जयपुर की पहाड़ियों पर बिछी चांदी की चादर

जयपुर-कूकस रोड पर कांस के फूलों का खिलना मानसून के जाने और शरद ऋतु के आगमन का पारंपरिक संदेश लेकर आया है।

संवाददाता: जयपुर टाइम्स डेस्क
मानसून की विदाई का प्राकृतिक संकेत: जयपुर की पहाड़ियों पर बिछी चांदी की चादर

जयपुर। मानसून अब अपनी विदाई की ओर है और प्रकृति ने मौसम बदलने का अपना अनूठा संदेश देना शुरू कर दिया है। जयपुर-कूकस रोड के आसपास इन दिनों दूर-दूर तक फैले कांस के सफेद फूल धरती पर बिछी चांदी की चादर जैसे प्रतीत हो रहे हैं। पहाड़ियों की हरी पृष्ठभूमि के बीच सफेद कांस का यह विस्तार एक ऐसा दृश्य रच रहा है, जो राहगीरों का ध्यान बरबस अपनी ओर खींच लेता है।

भारतीय लोक-परंपरा में कांस के फूलों का खिलना वर्षा ऋतु की विदाई और शरद ऋतु के आगमन का प्रतीक माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने भी रामचरितमानस में इसका वर्णन करते हुए लिखा है कि जब धरती कांस के फूलों से ढक जाती है, तो यह संकेत होता है कि वर्षा ऋतु अब बूढ़ी हो चुकी है। यह सदियों पुरानी मान्यता आज भी उतनी ही जीवंत है, जब हवा के साथ ये महीन सफेद रेशे लहराते हैं और पूरा क्षेत्र एक धुंधले-सफेद रंग में बदल जाता है।

वैज्ञानिक रूप से 'सैकरम स्पोंटेनियम' के नाम से जानी जाने वाली यह वनस्पति जंगली गन्ने की प्रजाति है। यह एक बहुवर्षीय घास है जो खाली पड़ी जमीन और नम मिट्टी वाले क्षेत्रों में तेजी से फैलती है। इसकी असली ताकत जमीन के नीचे मौजूद राइजोम में होती है, जो इसे अनुकूल परिस्थितियों में बड़े पैमाने पर विस्तार करने में मदद करते हैं। ग्रामीण जीवन में कभी इन फूलों का उपयोग गद्दे और तकिए भरने के लिए किया जाता था, हालांकि आधुनिक समय में यह उपयोग अब कम हो गया है।

कांस केवल अपनी सुंदरता के लिए ही नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र में अपनी भूमिका के लिए भी महत्वपूर्ण है। इसकी जड़ें मिट्टी को बांधकर रखने में सहायक होती हैं, जिससे भूमि कटाव को कम करने में मदद मिलती है। कूकस रोड पर फैला यह सफेद नजारा केवल फूलों की खूबसूरती नहीं, बल्कि मौसम के संक्रमण की पूरी कहानी कहता है। यह दृश्य स्पष्ट करता है कि बरसात का मौसम अब अपने अंतिम पड़ाव पर है और शरद ऋतु ने दस्तक दे दी है।

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