पेपर लीक पर नकेल: सरकार ने पेश किया नया बिल, 10 करोड़ तक का जुर्माना और सख्त जेल का प्रावधान
केंद्र सरकार ने परीक्षाओं में धांधली रोकने के लिए लोकसभा में नया संशोधन विधेयक पेश किया है, जिसमें जांच के लिए 60 दिन की समय सीमा और संगठित अपराधों के लिए 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रस्ताव है।

नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षाओं की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए एक कड़ा कदम उठाते हुए लोकसभा में नया संशोधन विधेयक पेश किया है। इस प्रस्तावित कानून का मुख्य उद्देश्य पेपर लीक और परीक्षा में होने वाली धांधली पर पूरी तरह से लगाम लगाना है। इसके तहत दोषियों के लिए जेल की सजा और जुर्माने की राशि में भारी बढ़ोतरी की गई है, ताकि संगठित गिरोहों और संस्थानों में डर पैदा किया जा सके।
नए विधेयक के अनुसार, सामान्य अपराधों के लिए सजा को तीन से पांच साल से बढ़ाकर पांच से दस साल कर दिया गया है। साथ ही, इन अपराधों पर लगने वाला जुर्माना भी अब 50 लाख रुपये तक हो सकता है। यह बदलाव उन लोगों के लिए एक कड़ा संदेश है जो मेधावी छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ करते हैं।
सेवा प्रदाताओं और उनके प्रबंधन के लिए भी नियम बेहद सख्त कर दिए गए हैं। पहले जहां सेवा प्रदाताओं पर एक करोड़ रुपये तक का जुर्माना था, उसे अब बढ़ाकर पांच करोड़ रुपये कर दिया गया है। प्रबंधन और निदेशकों के लिए भी जुर्माने की राशि में इसी तरह की बढ़ोतरी की गई है। परीक्षा केंद्रों के प्रभारी अधिकारियों के लिए भी सजा का दायरा बढ़ाकर पांच से दस साल की जेल और पांच करोड़ रुपये तक का जुर्माना तय किया गया है।
संगठित अपराध नेटवर्क को लक्षित करते हुए, विधेयक में न्यूनतम सात साल की जेल और 10 करोड़ रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। यह कदम उन सिंडिकेट्स को तोड़ने के लिए उठाया गया है जो परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए काम करते हैं।
न्यायिक प्रक्रिया में देरी को रोकने के लिए, विधेयक में जांच पूरी करने की समय सीमा 60 दिन तय की गई है। चाहे जांच स्थानीय पुलिस करे या केंद्रीय एजेंसियां, उन्हें इस अवधि के भीतर काम पूरा करना होगा। इसके बाद, विशेष फास्ट ट्रैक अदालतों में आरोप पत्र दाखिल होने के तीन महीने के भीतर सुनवाई पूरी करना अनिवार्य होगा।
अदालतों में बार-बार स्थगन लेने की प्रथा पर भी रोक लगाई गई है। अब किसी भी स्थगन के लिए लिखित में ठोस कारण देना अनिवार्य होगा। इसके अलावा, राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को इन मामलों की सुनवाई के लिए विशेष लोक अभियोजक नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है, ताकि न्याय प्रक्रिया में तेजी लाई जा सके।
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