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एमसीडी के मल्टी-लेन फ्री-फ्लो टोल टेंडर पर विवाद, बोलीदाताओं ने लगाए पक्षपात के आरोप

नगर निगम के मल्टी-लेन फ्री-फ्लो टोल सिस्टम के लिए जारी टेंडर पर बोलीदाताओं ने सवाल उठाए हैं, जिसमें शर्तों को लेकर पक्षपात की आशंका जताई गई है।

संवाददाता: जयपुर टाइम्स डेस्क

नई दिल्ली। दिल्ली नगर निगम द्वारा मल्टी-लेन फ्री-फ्लो टोलिंग सिस्टम को लागू करने के लिए जारी किए गए टेंडर पर विवाद गहरा गया है। कई संभावित बोलीदाताओं ने टेंडर की शर्तों पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे पक्षपातपूर्ण करार दिया है। कंपनियों का आरोप है कि निविदा में शामिल तकनीकी और वित्तीय मानदंड इस तरह से तैयार किए गए हैं कि वे चुनिंदा संस्थाओं को लाभ पहुंचाते हैं और प्रतिस्पर्धा को सीमित करते हैं।

विवाद का मुख्य कारण टेंडर में दी गई कठोर पात्रता शर्तें हैं, जिन्हें उद्योग जगत के विशेषज्ञों ने मानक प्रथाओं के विपरीत बताया है। कई कंपनियों ने नगर निगम के अधिकारियों को औपचारिक शिकायतें भेजी हैं, जिसमें टेंडर की शर्तों की समीक्षा करने और एक समान अवसर सुनिश्चित करने की मांग की गई है। कंपनियों का तर्क है कि तकनीकी विनिर्देशों की प्रकृति ऐसी है जो अन्य सक्षम फर्मों को दौड़ से बाहर कर देती है और परियोजना की लागत को अनावश्यक रूप से बढ़ा सकती है।

मल्टी-लेन फ्री-फ्लो तकनीक का उद्देश्य शहरी यातायात को आधुनिक बनाना है, ताकि वाहन बिना रुके टोल पार कर सकें और जाम की समस्या कम हो सके। यह पहल दिल्ली-जयपुर राजमार्ग सहित प्रमुख मार्गों पर निर्बाध इलेक्ट्रॉनिक टोल संग्रह को एकीकृत करने के राष्ट्रीय प्रयासों का हिस्सा है। हालांकि, इस विवाद के कारण राजधानी में स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के कार्यान्वयन में देरी होने की संभावना बढ़ गई है।

नगर निगम के अधिकारियों का कहना है कि टेंडर की शर्तें शहर के टोल नेटवर्क की सुरक्षा और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई हैं। उनका दावा है कि ये तकनीकी आवश्यकताएं राष्ट्रीय डेटाबेस के साथ तालमेल बिठाने के लिए अनिवार्य हैं। इसके बावजूद, उद्योग जगत के बढ़ते दबाव को देखते हुए निगम के भीतर टेंडर की शर्तों में संभावित बदलावों पर विचार किया जा रहा है।

जैसे-जैसे आवेदन की समय सीमा नजदीक आ रही है, प्रशासन पर इन शिकायतों का समाधान करने का दबाव बढ़ गया है ताकि कानूनी अड़चनों से बचा जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि तकनीकी विनिर्देशों में पारदर्शिता लाने से बोलीदाताओं का भरोसा बहाल हो सकता है। इस विवाद का परिणाम यह तय करेगा कि भविष्य में जटिल डिजिटल तकनीकों से जुड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए टेंडर प्रक्रिया कैसे संचालित की जाएगी।

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