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‘सिन्धु-साक्षी’ पॉवर से सुपरपॉवर!

दीपा करमाकर और साक्षी मलिक के परिवारों ने अपनी बेटियों की तैयारी के लिए ख़ुद अपना घर-बार सब कुछ दाँव पर न लगा दिया होता, तो उनकी कहानियाँ आज किसी के सामने न होती. इनके और गोपीचन्द जैसों के लिए ‘ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग’ जैसी कोई योजना बननी चाहिए न! ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के लिए तो हम बहुत काम कर रहे हैं, कुछ थोड़ा-सा काम ‘ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग’ के लिए भी हो जाये!

नाचो, गाओ, ढोल बजाओ, जश्न मनाओ! बैडमिंटन में पी वी सिन्धु का शानदार कमाल! बेमिसाल. सोना नहीं जीत पायीं, लेकिन चाँदी भी कम नहीं. सिन्धु हारीं, तो अपने से कहीं बेहतर और दुनिया की नम्बर एक खिलाड़ी कैरोलिना मरीन से. और कुश्ती में साक्षी मलिक की दमदार जीत. हार से लौट कर भी जीत की कहानी लिख देना, मामूली बात नहीं और किसी गोल्ड मेडल से कम नहीं! और त्रिपुरा की जिमनास्ट दीपा करमाकर के बिना तो रियो की कहानी कभी पूरी ही नहीं हो सकती. वह मेडल नहीं जीत पायीं, लेकिन देश का दिल उन्होंने ज़रूर जीता. ऐसा अदम्य हौसला, ऐसी लगन, ऐसी मेहनत, ऐसा समर्पण अद्भुत है.

Olympics 2016 : PV Sindhu, Sakshi Malik & Deepa Karmakar – 3 stories of National Pride
रियो से ये विश्वविजय की, गौरव की, प्रेरणा की तीन लाजवाब कहानियाँ हैं, जिनकी चर्चा बहुत दिनों तक होती रहेगी. होनी भी चाहिए. इन पर सारे देश में ख़ूब धूमधाम हो, इतनी कि देश के बच्चे-बच्चे में ललक उठे कि एक दिन उसे भी ओलिम्पिक जीत कर दिखाना है, उसे भी विश्वविजयी बनना है, उसे भी राष्ट्रीय गौरव की कोई बेमिसाल कहानी लिखनी है, ऐसी कोई छाप छोड़नी है कि सदियों तक पीढ़ियाँ उसके नाम पर गर्व से इतराती रहें. लेकिन रियो से इसके अलावा भी कुछ अच्छी और कुछ बुरी कहानियाँ हैं, जिन्हें हम भारतीय अपनी सुविधा से भूल जायेंगे! और बस हमसे सारी गड़बड़ यहीं होती है. और इसीलिए हम सिर्फ़ कभी-कभार ही गिनती की कुछ बड़ी कहानियाँ लिख पाते हैं.

56 Years Long Journey between 2 Bronze Medals
कुश्ती : एक पदक के बाद दूसरा दाँव छप्पन साल बाद!
1952 के हेलसिंकी ओलिम्पिक में खशाबा दादासाहेब जाधव ने पुरुष कुश्ती में कांस्य पदक जीता था. वह हमारी पैदाइश के पहले की बात है. शायद तब भी बड़ी ख़ुशी मनी होगी. मननी भी चाहिए. लेकिन कुश्ती में अगला पदक जीतने के लिए हमको 56 साल का लम्बा इन्तज़ार करना पड़ा. हाँ, यह ज़रूर है कि 2008 में सुशील कुमार के कुश्ती कांस्य पदक के बाद से हम हर ओलिम्पिक में इस स्पर्धा में कुछ न कुछ जीत रहे हैं. लेकिन दूसरे खेलों में ऐसा नहीं है. 1996 में लिएंडर पेस ने टेनिस में कांस्य पदक जीता, तब भी बड़ी ख़ुशी मनी थी, लेकिन टेनिस में वह हमारा पहला और आख़िरी पदक है! निशानेबाज़ी (शूटिंग) में ज़रूर 2004 में राज्यवर्द्धन राठौर ने रजत पदक जीत कर जो सिलसिला शुरू किया था, उसे 2008 में अभिनव बिन्द्रा (स्वर्ण) और 2012 में गगन नारंग (कांस्य) ने जारी रखा. लेकिन इस साल हम वहाँ खाता नहीं खोल पाये. ऐसा ही कुछ बाक्सिंग में भी हुआ. बैडमिंटन में 2012 में सायना नेहवाल के कांस्य पदक के सिलसिले को सिन्धु ने इस साल ज़रूर बेहद शानदार तरीक़े से आगे बढ़ाया है.

Olympics 2016 : जश्न भी, तो कुछ सवाल भी!
तो कुल मिला कर अभी हम कुश्ती, निशानेबाज़ी और बैडमिंटन से ही अगले ओलिम्पिक में सफलता की कुछ कहानियों की उम्मीद कर सकते हैं. इतने बड़े देश में हम सफलता की बड़ी कहानियाँ लगातार क्यों नहीं लिख पाते, क्या यह सोचने की ज़रूरत नहीं? क्या इस पर सवाल नहीं उठाया जाना चाहिए? वैसे सवाल उठाना आजकल बड़े जोखिम का काम हो चुका है. ऊपर से नीचे तक लोग हाथ धो कर पिल पड़ते हैं. फिर भी यह जोखिम मैं उठा रहा हूँ!

Pullela Gopichand : Amazing story of Committment and Dedication
तो बड़ी कहानियों को तो हर कोई लपकता है, उन पर गर्वित होता है, श्रेय लूटता है, उसमें कोई हर्ज नहीं. लेकिन इसमें चार चाँद लग जायें, जब हम साथ में बहुत-सी दूसरी कहानियों को भी देखने, जानने, समझने का वक़्त निकालें. सिन्धु की कहानी चमाचम चमकदार है, लेकिन उससे भी कहीं ज़्यादा शानदार है उसके कोच पुलेला गोपीचन्द की कहानी, जिसने अथक मेहनत कर और ज़रूरत पड़ने पर अपना घर तक गिरवी रख कर अपनी बैडमिंटन अकादमी के लिए पैसा जुटाया और बैडमिंटन खिलाड़ियों की ऐसी नयी पीढ़ी तैयार की जो शायद अगले कुछ बरसों तक दुनिया पर राज करे. सायना नेहवाल और सिन्धु के अलावा किदम्बी श्रीकान्त से भी बड़ी उम्मीदें की जा सकती हैं. श्रीकान्त दुनिया के नम्बर तीन शटलर और पिछले दो बार के ओलिम्पिक चैम्पियन लिन डैन से क्वार्टरफ़ाइनल बस जीतते-जीतते ही रह गये. मेरे ख़याल से उस मैच में श्रीकान्त का खेल बड़ा अच्छा था, लेकिन ‘माइंड गेम’ में वह कमज़ोर पड़ गये.

‘चलता है’ सो ‘माइंड गेम’ नहीं चलता!
यह ‘माइंड गेम’ भारतीय खिलाड़ियों की सबसे बड़ी कमज़ोरी है. वरना शायद हमारे कुछ और खिलाड़ी यक़ीनन कुछ और पदक जीत सकते थे. वे वाक़ई पदक जीतने की योग्यता रखते थे, फिर भी नहीं जीत पाये. पिछले कुछ सालों से खिलाड़ियों में ‘किलर इंस्टिक्ट’ के लिए मनोवैज्ञानिक प्रशिक्षण दिये जाने की शुरुआत हुई है, लेकिन इसके लिए अभी बहुत कुछ किया जाना बाक़ी है. कई बार हम भारतीय अपनी नैसर्गिक ‘चलता है’ की प्रवृत्ति के चलते छोटे-छोटे अनुशासनों की परवाह नहीं करते, जिसकी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है. इसका इलाज कहीं और नहीं, ख़ुद हमारे ही पास है. कैसे?

क्रिकेट में कैसे बदल गया ‘एटीट्यूड?’
क्रिकेट को लीजिए. कुछ साल पहले तक हम क्रिकेट में भी ‘ढुलमुल यक़ीन’ ही दिखते थे. कब हार जायें, कब जीत जायें, कुछ पता नहीं. अस्सी के दशक में जब केरी पैकर ने रंगीन कपड़ों में दिन-रात के क्रिकेट की शुरुआत की, तो उसकी बड़ी आलोचना हुई. लेकिन उस क्रिकेट ने आगे चल कर न सिर्फ़ समूचे क्रिकेट को बदला, बल्कि कुछ बरस बाद भारतीय क्रिकेट को भी बदल दिया. क्रिकेट में अथाह पैसा आने से खिलाड़ियों को ख़ुद-ब-ख़ुद समझ में आ गया कि ‘हार्डकोर प्रोफ़ेशनल’ नहीं बनोगे, तो पैसा नहीं बना पाओगे. पैसा खोना किसे अच्छा लगता है? नतीजा? इस पैसे ने हमारे सारे के सारे क्रिकेटरों की बैटिंग, बॉलिंग, फ़ील्डिंग, थ्रो से लेकर अनुशासन, प्रैक्टिस, रुझान और पूरा का पूरा ‘एटीट्यूड’ ही बदल दिया. मतलब यह कि ठान लिया जाये कि ‘एटीट्यूड’ बदलना है, तो वह चुटकी बजाते बदल जायेगा. क्रिकेट में तो पैसे ने यह काम कर दिया, लेकिन बाक़ी खेलों में यह काम कैसे हो? इस सवाल का जवाब आये बिना हम ग़ैर-क्रिकेट खेलों में बड़े करिश्मे लगातार नहीं कर पायेंगे.

संयोग से नहीं होता करिश्मा!
करिश्मा संयोग से नहीं होता. किया जाता है. इसी ओलिम्पिक में इस बार पुरुष हॉकी के फ़ाइनल में दो ऐसी टीमें खेलीं, जिन्हें कोई किसी गिनती में नहीं रखता था. लेकिन बेल्जियम और अर्जेंटीना ने बड़े-बड़े दिग्गजों की मिट्टी पलीद कर दी. यह क्या संयोग से हो गया?

चीन ने कहा था 60, ले गये इकसठ!
बरसों पहले की बात है. बड़े लम्बे अन्तरराष्ट्रीय प्रतिबन्ध के बाद 1982 के एशियाई खेलों में पहली बार चीन के लिए दरवाज़े खोले गये थे. चीनी खिलाड़ी कई बरसों से दुनिया की हर प्रतियोगिता से बाहर थे. वे कहीं खेल नहीं सकते थे, लेकिन वे सुस्त नहीं पड़े, आराम से नहीं बैठे, अभ्यास में कोई कोताही नहीं की. और जब चीनी दल एशियाड के लिए दिल्ली आया तो इस दावे के साथ कि वह कम से कम साठ स्वर्ण पदक जीतेगा. और वे इकसठ स्वर्ण पदक जीत कर लौटे! दावे से एक गोल्ड मेडल ज़्यादा! इसे कहते हैं तैयारी और अनुशासन, जो किसी देश को खेलों का सुपरपॉवर बनाता है. क्या हम करते हैं ऐसी तैयारी? करना चाहते हैं ऐसा? बनना चाहते हैं खेलों के सुपर पॉवर?

The queer case of wrestler Narsingh Yadav in Olympics 2016
यह ‘एटीट्यूड’ हर जगह चाहिए. नरसिंह यादव का मामला लीजिए. ‘नाडा’ ने उन्हें ‘क्लीयरेन्स’ दे दी. उसके बाद सब हाथ पर हाथ धर कर बैठ गये. पहले से यह क्यों नहीं सोचा गया कि ओलिम्पिक में मामला न बिगड़े, इसके लिए कुछ करके चलना चाहिए. शुरू से कहा जा रहा है कि नरसिंह के ख़िलाफ़ साज़िश हुई. किसी ने उसके खाने की चीज़ों में स्टेरायड मिला दिये. यह कोई मामूली आरोप है? यह देश के विरुद्ध सीधी साज़िश है. सीधे-सीधे देशद्रोह का मामला है. लेकिन तब कुछ नहीं किया गया. अब माँग की जा रही है कि सीबीआइ जाँच हो. अरे अगर तभी देशद्रोह का मामला दर्ज हो गया होता, सीबीआइ जाँच शुरू हो गयी होती तो कम से कम ‘वाडा’ और ‘कैस’ (कोर्ट ऑफ़ आर्बिट्रेशन फ़ॉर स्पोर्ट्स) के सामने आपकी इस बात का कुछ वज़न होता कि नरसिंह साज़िश के शिकार हुए हैं. लेकिन आपने तथाकथित साज़िश के ख़िलाफ़ कुछ किया ही नहीं, तो दुनिया साज़िश की थ्योरी कैसे मान ले? पूरा मामला दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन इस दुर्भाग्य का दोषी कौन है? भाग्य या हम ख़ुद?

तो अब ‘ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग’ की बात करें?
दीपा करमाकर और साक्षी मलिक के परिवारों ने अपनी बेटियों की तैयारी के लिए ख़ुद अपना घर-बार सब कुछ दाँव पर न लगा दिया होता, तो उनकी कहानियाँ आज किसी के सामने न होती. इनके और गोपीचन्द जैसों के लिए ‘ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग’ जैसी कोई योजना बननी चाहिए न! ‘ईज़ ऑफ़ डूइंग बिज़नेस’ के लिए तो हम बहुत काम कर रहे हैं, कुछ थोड़ा-सा काम ‘ईज़ ऑफ़ प्लेयिंग’ के लिए भी हो जाये! आज की दुनिया में ओलिम्पिक मेडल भी सुपरपॉवर होने की निशानी हैं. तो ‘सिन्धु-साक्षी’ पॉवर से बनिए न सुपरपॉवर! कौन रोकता है?

हिन्दू कठमुल्लावाद के कारण खेल की दुर्गति हुई है !

ओलम्पिक दुनिया का सबसे बड़ा खेल आयोजन होता हे फुटबॉल जैसे खेल को छोड़ दे तो बाकी सभी खेलो में वर्ल्ड कप चेम्पियन होने से भी अधिक सम्मान और गौरव की बात ओलम्पिक चेम्पियन होना या ओलम्पिक में कोई भी पदक जीतना माना जाता हे सभी खिलाड़ियों के लिए कहा जाता हे की वो अपना बेस्ट ओलम्पिक के लिए बचा कर रखते हे ओलम्पिक में जीत क्या मायने रखती हे इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाइये की ओलम्पिक चेम्पियन खिलाडी फिर ताउम्र ओलम्पिक चेम्पियन ही कहलाता हे उसे पूर्व चेम्पियन नहीं कहा जाता हे रियो ओलम्पिक में उमीद तो थी की भारत पहली बार दो अंको में मैडल जीतेगा ( वैसे जीत तो सिर्फ गोल्ड ही होती हे इसलिए टेली सिर्फ गोल्ड से ही बनती हे लेकिन ओलम्पिक भावना की वजह से बाकी दो ओलम्पिक पदको का भी भारी सम्मान होता हे ) हर बात की तरह ही हमारे पी एम् की भारत को पदक जिताने के विषय में कुछ भी लफ़्फ़ाज़िया सामने आयी थी लेकिन नतीजा पिछले तीन ओलंपिक में सबसे ख़राब प्रदर्शन के रूप में सामने आया सवा अरब के देश की ओलम्पिक या कहे की खेलो में ही असफलता कितनी जबरदस्त हे इसका अंदाज़ा इस बात से लगाइये की दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश हॉकी टीम से इतर सिर्फ एक गोल्ड मैडल सौ सालो के इतिहास में ले पाया हे वो भी पसीने के कम और एकाग्रता के खेल में ( अभिनव बिंद्रा शूटिंग ) इससे भी ज़्यादा शर्मनाक बात की भारत से दस नहीं बीस गुना अधिक मैडल और गोल्ड मैडल सिर्फ कुछ देशो ने भी नहीं बल्कि सिर्फ कुछ खिलाड़ियों ने अकेले ही जीत रखे हे जेसे की माइकल फेल्प्स बोल्ट कार्ल लुइस नुरमी आदि पदको की लिस्ट पर गौर करे तो कई कठमुल्लावादी हास्यपद पाबंदियों वाले बिहार से भी छोटे देश ईरान तक ने तीन गोल्ड और टोटल 8 मैडल जीते पूर्व युगोस्लाविया के कई टुकड़े हुए थे उसके टुकड़े के भी टुकड़े से बना शायद हमारी किसी बड़ी विधानसभा सीट से भी छोटा देश कोसोवो तक एक गोल्ड जित लेता हे इसके अलावा भारत से भी अधिक भ्र्ष्टाचार और गृहयुद्ध , छोटे छोटे और अराजकता गरीबी भुखमरी बेहद कम आबादी के देश जैसे जॉर्जिया अल्जीरिया उज्बेकिस्तान इथोपिया अजरबेजान कोलोम्बिया मिस्र ट्यूनेशिया जोर्डन जैसे देशो ने भी ओलम्पिक में भारत से तो बहुत बेहतर किया हे!

अब आप देखे की हमेशा की तरह इस भयंकर हार के बाद चारो तरफ हज़ारो लेख छप रहे हे जिसमे हार की चीर फाड़ हो रही हे और वो ही कारण बताय जा रहे हे जो की उन छोटे छोटे देशो में भी हे ही जिनका पर्दशन भारत से तो बहुत बेहतर रहा ही जैसे क्रिकेट जैसे आरामतलब फालतू खेल के लिए दीवानगी सुविधाओ की कमी भ्र्ष्टाचार नेताओ की मनमानी आदि आदि ये सब भी सही हे और ये भी सच हे की पिछले सालो में फिर भी क्रिकेट से इतर खेलो के लिए फिर भी हालात बनिस्पत बेहतर ही हुए हे पहले तो ये हाल था की जीत पर भी कुछ नहीं मिलता था जबकि अब खिलाड़ियों को कम से कम इतना तो पता हे की एक जीत उन्हें करोड़ो में लाद देगी दूसरे खेलो को अब स्पांसर भी मिलने लगे ही हे वो भी अब ठीक ठाक कमा रहे ही हे वार्ना भारत के कितने ही पुराने ओलम्पिक एशियाड होकि फुटबॉल के खिलाड़ियों की दुदर्शा की खबरे आती रही हे वास्तव में अगर भारत जैसे की आस लगाई गयी थी दस बीस ओलम्पिक मैडल जीत लेता तो भी वो चीन जैसे देश से सात गुना कम ही होते वो भी बड़ी विफलता ही होती तब ये जो कारण विभिन्न लेखों में आजकल चारो तरफ पेले जा रहे हे जिनमे हालात को सुविधाओ को फण्ड की कमी नेताओ आदि को कोसा जा रहा हे तब तो वो सही होते और हे भी . और चलिए मान लिया की चारो तरफ छप रहे लेखों की बात मान भी ली गयी जैसे ये बता रहे हे वैसे हो भी गया और भारत ने अगली बार दो की जगह दस भी मैडल जीत भी लिए ( गोल्ड की तो बात ही ना करे ) तो भी तो हम चीन जैसे देशो से बहुत बहुत बहुत पीछे होंगे ही ——– ? भारत की ओलम्पिक में विफलता तो शायद मानव इतिहास की ही खेलो में सबसे बड़ी विफलता कही जा सकती हे आखिर क्यों इतना बड़ा देश जहां अब अरबपतियों करोड़पतियों लखपतियों की कतार लगी हे ( अभिनव बिंद्रा ने भी शायद खुद की ही वेल्थ के दम पर सुविधाय जुटा कर भारत का एकलौता नॉन हॉकी गोल्ड जीता था ) वो इथोपिया जैसे अकालग्रस्त भुखमरे जैसे देश से भी पिछड़ा हुआ हे मेरा अन्दाज़ा हे की भारत की खेलो में इस अदभुत विफलता का सबसे बड़ा राज़ हे ”हिन्दू कठमुल्लावाद ” !

भारत में सबसे अधिक पैसा और संसाधन इसी हिन्दू कठमुल्लावादी सोच और वर्ग के पास ही हे और साफ़ हे की ये वर्ग ना तो खुद खेलो में कुछ करता हे ( हिंदुत्व की प्रयोगशाला पेसो में सबसे आगे पर खेलो में फिसड्डी ) ना ही किसी और को ही कोई प्रोत्साहन देता हे जैसे की चीनी मिडिया ने साफ़ साफ़ लिखा हे की भारत की खेलो में इतनी बेमिसाल विफलता का एक बड़ा राज़ हे शाकाहार . और शाकाहार पर सबसे अधिक जोर भारत में हिन्दू कठमुल्लावादी वर्ग ही देता हे अगर में गलत नहीं हु तो इस वर्ग की हरकत देखिये की इसने शाकाहार के नाम पर शायद मध्यप्रदेश में गरीब आदिवासी दलित बच्चो से अंडा तक बन्द करवाने की कोशिश की थी इसका मतलब ये नहीं हे की में शाकाहार के खिलाफ हु नहीं शाकाहारी होना भी बहुत अच्छी और सेहतमंद बात हे मगर क्या करे की अधिकतर खेलो में जीतने के लिए आपको सिर्फ सेहतमंद और रोगों से दूर ही नहीं रहना होता हे बल्कि बहुत ही ज़बरदस्त दमखम भी चाहिए होता हे ( इस दमखम की हमारे देश में कितनी कमी हे की अंदाज़ा लगाइये जिस क्रिकेट के लिए भारत में इतनी दीवानगी हे इतनी सुविधाय हे उस तक में भारत आज तक एक भी शुद्ध खूंखार फास्ट बोलर देने में विफल रहा हे इस विफलता को इस तरह से ढंका गया की भारत के बनियो ने क्रिकेट को अपने पेसो और आबादी के दम पर अपने कब्ज़े में लेकर फ़ास्ट बोलिंग को ही बधिया करवा दिया उसका रूप ऐसा बदलाhttp://khabarkikhabar.com/arch ives/1770 की पिछले दिनों महान फ़ास्ट बोलर ग्लेन मैक्ग्रा ने भी शिकायत की की अब फ़ास्ट बोलिंग बर्बाद हो रही हे लेकिन ये सब मक्कारियां चालाकियां और पेसो का रुतबा क्रिकेट जैसे दुनिया के लिए बेमतलब बेमकसद फालतू और आलसियों के खेल में तो चल सकता हे बाकी खेलो ओलम्पिक एशियाड कॉमनवेल्थ और फुटबॉल आदि में नहीं ) इस दमखम के लिए जो खाना जरुरी होता हे वो खाया जाता ही हे साइना नेहवाल की ही बात करे तो वो शुद्ध शाकाहारी थी मगर कोच पुलेला गोपीचंद की सलाह मानकर उन्होंने चिकन खाना शुरू किया और मैडल जीते अब चाहे तो वो और मैडल जीत जीत कर अपना कॅरियर खत्म कर फिर से वेजेटेरियन हो जाए तो कोई हर्ज़ नहीं हे .

अब अंदाज़ा लगाइये देश की सबसे अधिक वेल्थ को अपने कब्ज़े में लिए बैठा हिन्दू कठमूल्लवादी कट्टरपन्ति वर्ग ने शुद्ध शाकाहार के प्रति कट्टरपंथ दिखाकर भारत को खेलो में कितना नुक्सान पहुचाया होगा इसी कारण ये वर्ग खुद भी खेलो में कुछ भी तो ना कर सका हे —- ? ऊपर से कोढ़ में खाज ये भी की इस वर्ग ने खेलो में खुद तो कभी कुछ किया ही नहीं देश का भारी आर्थिक शोषण करके देश में भारी असमानता फैलाकर इसने दुसरो को भी खेलो में कुछ नहीं करने दिया करे कैसे भला जब आर्थिक शोषण लूट और असामनता की वजहों से देश के एक बड़े हिस्से को तो रोटी कपड़ा मकान की समस्याओ से ही कोई निजात नहीं हे खेलो के लिए ऊर्जा कहा से लाये ज़ाहिर हे शाकाहार के प्रति इस वर्ग की सनक को सम्मान ही दिया जा सकता था की भाई जब आपको जानवरो से इतना प्रेम हे तो इंसानो से दस गुना अधिक होना चाहिए था मगर ये वर्ग कभी भी इंसानो के शोषण से बाज़ नहीं आया शोषण लूट भी ऐसी जो शायद ही दुनिया में कही और भी होती हो प्रेमचंद की ” सवा सेर गेंहू ” जैसी शोषण की कहानिया शायद ही किसी और देश में लिखी गयी हो यानी बात बिलकुल साफ हे यानी जब तक देश के सबसे अधिक संसाधन और पैसा हिन्दू कट्टरपन्ति कठमुल्लावादी वर्ग के कब्ज़े में रहेंगे तब तक भारत की खेलो में इसी तरह से दुदर्शा होती रहेगी और हमें क्रिकेट की फ़र्ज़ी खरीदी हुई फालतू उपलब्धियों पर बाकी खेलो में इक्कादुक्का व्यक्तिगत उपलब्धियों से ही सन्तोष करना पड़ेगा और दुनिया हम पर हँसती रहेगी

ध्यानचंद से पहले ही धोनी का बायोपिक भी, हिट भी ” यानी आगे भी खेलो में कोई उमीद नहीं !

हॉकी के सबसे बड़े खिलाडी ध्यांचंद से पहले सचिन को भारत रत्न देने की बेहूदगी तो कोंग्रेस सरकार ने की ही थी अब फिर से उनका अपमान हो रहा हे .कई ओलम्पिक गोल्ड दिलवाने वाले ध्यानचंद की जिस तरह उपेक्षा हो रही हे उससे साफ हे की आने वाले समय में भारत के लिए खेलो में कोई उमीद नहीं हे वरिष्ठ फिल्म लेखक जयप्रकाश चोकसे बताते हे की मुम्बई की आरती और पूजा शेट्टी बहनो ने काफी खर्चा करके ध्यानचंद पर फिल्म के लिए पटकथा लिखवाई हुई हे मगर सालो से उनकी बायोपिक पर फिल्म का काम शुरू नहीं हो पाया हे क्योकि कोई भी सितारा ध्यानचंद बनने को इसलिए राजी नहीं हे क्योकि परदे पर ही सही मगर हॉकी जैसे ताकत के खिलाडी वो भी ध्यानचंद दिखने में दांतो से पसीना आ जाएगा ये जानते हुए भी की ऐसी फिल्म उनको अनेक देशी विदेशी अवार्ड भी दिलवा सकती हे तब भी नहीं , क्योकि कोई भी सितारा ध्यानचंद बनने दिखने के लिए की जाने वाली कड़ी मेहनत करने को राजी नहीं हे इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता हे की भारत के लोगो ( ऊँचे भी ) में दमखम की कितनी कमी हे आगे भी भला कैसे मैडल आएंगे — ? ये वही सितारे हे जो रोज दावा करते मिलते हे की फला फिल्म के लिए इतना वजन बढ़ाया या घटाया या ऐसी तैयारी की वैसी तैयारी की . अब यही लोग ध्यानचंद वो भी सिर्फ परदे पर भी बनने को तैयार नहीं हे क्योकि हॉकी जैसा दमखम का खेल सिर्फ परदे पर ही खेलने के लिए भी जो तैयारी चाहिए उसके लिए भी इनमे हिम्मत नहीं हे जबकि उधर देखिये की जिस क्रिकेट जैसे फालतू खेल की फ़र्ज़ी उपलब्धियों पर हमसे ज़बरदस्ती गर्व करवाया जाता हे उसके ही एक खिलाडी धोनी पर ही कितने आराम से बायोपिक बन भी गया यही नहीं वो काफी हिट भी हो गया यानी इस खेल का खिलाडी बनना ( परदे पर ) इतना आसान हे वही ध्यानचंद बनने से कितने ही नौजवान सितारे साफ़ इनकार कर चुके हे क्योकि कोई परदे पर भी हॉकी या फुटबॉल का खिलाडी दिखने के लिए भी होने वाली मेहनत पसीने और चोटो को तैयार नहीं हे ले देकर आमिर खान से ही कुछ उमीद की जा सकती हे मगर एक अकेला भला क्या क्या कर सकता हे हाल ही में वो अपनी कुछ जान तक जोखिम में डाल कर 25 25 किलो वेट बढ़ घटाकर दंगल फिल्म के लिए पहलवान महावीर सिंह की जवानी और अधेड़ावस्था फिल्मा चुके हे .

धोनी पर बनी बायोपिक का हिट होना भी दुखी करने वाली बात हे धोनी एक अच्छे खिलाडी हे मगर कोई ऐसे महानतम भी नहीं हे की जिन पर पिक्चर बनाई जाती मगर क्रिकेट फिल्म और धर्म क्योकि भारतीय जनता की अफीम हे सो एक क्रिकेट खिलाडी धोनी पर उनके के रिटायर होने से भी पहले ही उन पर फिल्म तक बन कर तैयार हो गयी जबकि धोनी की खेल में सारी की सारी उपलब्धिया भी उस दौर की हे जब ये खेल ही सारा भारत बेस्ड हो चुका हे ऐसे में धोनी की उपलब्धियां कितनी असली हे कितनी फ़र्ज़ी हे कुछ कहा नहीं जा सकता हे भारत की 2007 वर्ल्ड कप हार के बाद जब क्रिकेट को भारी घाटा हो रहा था भारत में क्रिकेट की लोकप्रियता हल्की से उतार पर थी तभी पहला टी २० आता हे जिसमे भारत की जीत के बाद क्रिकेट का ये नया फॉर्मेट सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बन जाता हे आई पि एल आता हे उसमे क्या क्या गड़बड़िया होती हे कैसे धोनी की टीम चेन्नई के मालिक श्रीनिवासन बी सी सी आई के अध्यक्ष भी होते हे कैसे फिर धोनी का एकछत्र राज़ हो ता हे आई पि एल में सट्टेबाज़िया होती हे खिलाड़ियों का नाम आता हे दबाया जाता हे सब जानते हे धोनी ने जो क्रिकेट वर्ल्ड कप 2011 जिताया उसके फाइनल से पहले एक पत्रकार साफ़ लिखते हे की भारत की जीत तो ”तय” हे फाइनल में श्रीलंका के खिलाड़ियों की बॉडी लेंग्वेज कही से भी वर्ल्ड कप फाइनल वाली नहीं थी वेस्टइंडीज जैसी टीम का तो पिछले सालो में ये हाल हुआ की उसके खिलाडी टीम से ज़्यादा बहुत ज़्यादा भारत और आई पि एल को महत्व देने लगे क्रिकेट में पूरी तरह ही ये हाल हे की ऑस्ट्रेलिया को छोड़ कर लगभग सभी देश सिर्फ भारत के साथ और भारत में खेल को उत्सुक रहते हे हार पर भी खुश होते हे पुराने खिलाडी बी सी सी आई से पैसा लेते हे और बदले में बी सी सी आई के फर्ज़ीवाड़े के खिलाफ कुछ नहीं बोलते हे भारत को छोड़ कर सभी देशो में मैदान खाली रहने लगे हे!

क्रिकेट अब सिर्फ भारत के दम पर ज़िंदा हे अब इस खेल के सभी नियम कायदे सब कुछ भारत के हिसाब से ही बनते हे यानी इन्ही सब हालातो के बीच में ही धोनी ने अपनी कामयाबियां हासिल की ? जिन्हें कोई भी सच्चा खेल प्रेमी कभी कोई खास महत्व दे ही नहीं सकता हे जो ध्यानचंद की उपलब्धियों के सामने कुछ भी महत्व नहीं रखती हे मगर उसी ध्यांचंद का पिछले सालो में लगातार दूसरी बार अपमान हुआ हे जब उनसे पहले ही धोनी की बायोपिक फिल्म भी आ चुकी हे और हिट भी हो चुकी हे साफ़ हे की तमाम लफ्फाजियों दावो के बाद भी आने वाले समय में भी भारत के लिए खेलो में कोई उमीद नहीं दिखाई देती हे देश में भयंकर गेर बराबरी आम आदमी को जहा रोजी रोटी से ही फुर्सत नहीं हे वही ऊँचा अमीर सम्पन्न वर्ग यहाँ इतना अधिक आराम उठा रहा हे की वो बिलकुल पिलपिला और गिलगिला हो चुका हे उच्च वर्ग यही पिलपिला और गिलगिलापन फिल्म सितारों ने दर्शाया जब उन्होंने ध्यानचंद पर बनने वाली फिल्म से साफ़ पीठ दिखा दी . जिस देश में ध्यानचंद जैसे महान खिलाडी का अपमान और सचिन जेसो को भारत रत्न और धोनी जेसो पर फिल्म बनती हो वो भला खाक खेलो में कुछ कर सकता हे आगे भी खेलो में भारत के लिए कोई भी उमीद नहीं हे!

ऐसा ‘खेल’ कौन खेलता है भाई?

देश में खेल से संबंधित दो बड़ी खबरें आईं, जिस पर बड़े स्तर पर लोगों का ध्यान गया. एक तो शायद आप सिनेमा हाल में जा कर देख भी चुके होंगे, जो बॉलीवुड के मिस्टर परफेक्शनिस्ट कहे जाने वाले आमिर खान की दंगल है. वहीं, दूसरी खबर आई है ‘डॉ. मशहूर गुलाटी’ की तरह मशहूर सुरेश कलमाड़ी और अभय सिंह चौटाला को भारतीय ओलंपिक संघ का आजीवन अध्यक्ष नामित करने की! आप कहेंगे कि दोनों खबरें एक सी कैसी हैं, तो मैं बताता दूं कि तालमेल है और यह अद्भुत तालमेल कुछ ऐसा है कि हमें पूछना पड़ रहा है कि ऐसा ‘खेल’ कौन खेलता है भाई? फिल्म ‘दंगल’ में यह बात साफ तौर पर दर्शाई गई है कि खिलाड़ियों के साथ और तमाम खेल संस्थानों में राजनीति होती ही है, जो अंततः हमारे पदकों की संख्या को कम कर देती है. दंगल में हालाँकि, कोच के ट्रेनिंग देने के लहजे और उसकी बेपरवाही पर सवाल उठा कर ही आमिर बच निकले हैं, पर हम सब जानते हैं कि देश भर में तमाम खेल संघ किस तरह से राजनीतिज्ञों के अखाड़े बने हुए हैं! आखिर, किस तरह से खिलाड़ियों को राजनीति की बिसात पर मोहरे की तरह चला जाता है और ऐसे में अच्छी से अच्छी प्रतिभा दम तोड़ देती है. खेल संघों में राजनेताओं के कब्ज़े की बात पर थोड़ा और व्यापकता से देखा जाए तो, भारत में सर्वाधिक लोकप्रिय क्रिकेट की संस्था बीसीसीआई में लोढ़ा कमेटी की सिफारिशों को लागू करने की खूब जद्दोजहद चली है. सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बावजूद बीसीसीआई के अनुराग ठाकुर और दूसरे पदाधिकारी टस-से-मस तक नहीं हो रहे हैं. यहां तक कि अनुराग ठाकुर को बीसीसीआई चीफ से हटाने तक की बात भी कई खबरों में सामने आ रही है, क्योंकि खबरों के ही अनुसार उन्होंने कोर्ट में गलत हलफनामा पेश किया है, पर ‘लोढ़ा कमिटी’ की सिफारिशों को यह धनाढ्य खेल संस्थान लागू ही नहीं कर रहा है और ‘भ्रष्टाचार के साथ अपारदर्शिता’ जस की तस बनी हुई है. यही हाल बीसीसीआई के पूर्व अध्यक्ष एन.श्रीनिवासन को लेकर भी था, जो सुप्रीम कोर्ट के डिसीजन के बाद हटे थे. कुल मिलाकर बात यह है कि तमाम खेल संघों में आख़िर राजनीतिज्ञों का क्या काम, जिस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय तक आपत्ति जता चुका है? मामला तब और गंभीर हो जाता है जब सुरेश कलमाड़ी और अभय सिंह चौटाला जैसे लोग भारतीय ओलंपिक संघ के आजीवन अध्यक्ष नामित कर दिए जाते हैं! समझा जा सकता है कि यह दोनों ही भ्रष्टाचार और गंभीर आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं.

समझना मुश्किल है कि इन दोनों का ओलंपिक जैसे खेल आयोजनों और खिलाड़ियों से क्या संबंध हो सकता है, सिवाय इसके कि वह ‘भ्रष्टाचार’ को बढ़ावा देते हैं? भारतीय ओलंपिक संघ जैसा संस्थान आखिर इन जैसे लोगों के ‘बंधुआ’ की तरह क्यों व्यवहार करता है, यह बात आज-कल और परसों तक राज ही रहने वाला है. हालांकि, खेल मंत्री विजय गोयल ने इस सन्दर्भ में यह जरूर कहा है कि ‘यह नियुक्तियां (कलमाड़ी और चौटाला की) स्वीकार नहीं की जाएंगी, क्योंकि दोनों ही आपराधिक आरोपों का सामना कर रहे हैं. गंभीर बात यह है कि भ्रष्टाचार पर सरकारें तक बदल गयीं और देश में इसके खिलाफ जबरदस्त माहौल भी चल रहा है, उसके बावजूद भी इस तरह की नियुक्तियां करने का साहस आखिर कहाँ से जुटा लिया जाता है? यह भी दिलचस्प है कि कलमाड़ी और चौटाला से पहले सिर्फ विजय कुमार मल्होत्रा ही थे, जिन्होंने 2011 और 2012 के बीच आईओए के कार्यवाहक अध्यक्ष के रूप में कार्य किया था, उन्हें आजीवन अध्यक्ष बनाया गया था. जहां तक बात सुरेश कलमाड़ी की है तो 1996 से 2011 तक आईओए पर उनका एक तरह से कब्ज़ा ही रहा. 2010 के दिल्ली कामनवेल्थ गेम्स घोटाले में उन्हें 10 महीने की जेल हुई और तब वह लाइमलाइट में ज्यादा आए और बदनाम हुआ, अन्यथा देश में ओलंपिक पदक की संख्या न बढ़ने का राज देशवासी कभी जान ही नहीं पाते! बेहद अजीब और हैरान करने वाली बात यह भी है कि अपराधिक और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों का सामना करने वाले व्यक्ति को आजीवन अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव सोचा भी कैसे गया? कम से कम इसका इतिहास तो देख लिया जाता, जब चौटाला दिसंबर 2012 से फरवरी 2014 तक आयोग के अध्यक्ष रहे था, तब उस समय अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने चुनाव में आईओए को ही निलंबित कर दिया था. इसके पीछे अंतर्राष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने तर्क दिया था कि इंडियन ओलंपिक असोसिएशन ने चुनाव में ऐसे उम्मीदवार उतारे थे, जिनके खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल थे. देखना दिलचस्प होगा कि खेल मंत्रालय इस मामले में रिपोर्ट मंगाने के बाद क्या कार्रवाई कर पाता है? इस बीच खिलाड़ियों के राजनीति का शिकार होने पर भी ध्यान दिया ही जाना चाहिए, आखिर जो खिलाड़ी अपना पूरा जीवन देश के लिए पदक जीतने में लगा देता है, उसे इन खेल संस्थानों से मदद की बजाय रूकावट ही क्यों मिलती है, इस बाबत जांच अवश्य किया जाना चाहिए.

आईओए जैसे संस्थानों के शीर्ष पर अगर अपराधी और भ्रष्टाचारी लोग बैठेंगे, तो पदक आखिर आएंगे कहां से? आमिर खान अपनी फिल्म दंगल में महावीर फोगाट के किरदार में एक बात बड़े साफ तौर पर कहते हैं, जो सभी खेल-प्रशासकों पर समान रूप से लागू होती है कि जब तक ‘ऐसे पदाधिकारी खेल संघों में कब्जा जमाए रहेंगे’, तब तक भारत में अन्य देशों के मुकाबले पदक लाना मुश्किल और नामुमकिन ही माना जाता रहेगा. आला दर्जे की बदतमीजी यह कि ‘इंडियन ओलिंपिक असोसिएशन (IOA) की चेन्नै में हुई आम सभा बैठक में भ्रष्टाचार के आरोपी आईएनएलडी के नेता अभय सिंह चौटाला लाइफटाइम प्रेजिडेंट चुने जाने को लेकर उठे सवालों के बाद बेशर्मी से कहते हैं कि “उन्हीं की वजह से भारतीय खिलाड़ी मेडल्स जीत रहे हैं.” आखिर सम्पूर्ण विश्व में इस हद तक गिरावट कहीं देखने को मिलेगी क्या? जहाँ तक मेडल्स की बात है तो देश के कुछ खिलाड़ियों का संघर्ष-स्तर इतना ऊंचा होता है कि व्यक्तिगत तौर पर वह तैयारी करके देश को पदक दिला पाने में सफलता हासिल कर पाते हैं, अन्यथा तमाम खेल संघ और पदाधिकारी खिलाड़ियों का हौसला तोड़ने में जरा भी कमी नहीं करते हैं. हालाँकि, जब हम देश में आ रहे ओलंपिक पदकों की संख्या को चीन या दूसरे देशों को प्राप्त पदकों से तुलना करते हैं तो एक भारतीय होने के नाते शायद ही गर्व महसूस करते होंगे! शायद ही कोई ओलंपिक गेम हो, जिसमें हमारे देश के पदकों की संख्या दहाई में पहुंची हो और कई बार तो हमें एक ‘कांस्य’ पदक से ही काम चलाना पड़ता है. ऐसे में चौटाला का बयान आला दर्जे की बेशर्मी कही जा सकती है. जिन्होंने दंगल पिक्चर देखी होगी या देखेगा, वह यह बात बखूबी समझ जाएगा कि कोई खिलाड़ी ओलंपिक के लिए तैयार होने में बचपन से ही जुट जाता है. कई तो 5 साल की उम्र से ही अखाड़े में कुश्ती करने लगते हैं या दूसरे खेलों में अभ्यास करने लगते हैं और यह अभ्यास ताउम्र चलता है. तमाम कठिनाइयों से जूझते हुए, समस्याओं से दो-चार होते हुए उनकी जिंदगी दांव पर लगी होती है, तो अभाव में जूझते-जूझते बाकी दुनिया से वह कट से जाते हैं, पर उनके मुख से उफ़ नहीं निकलती है, क्योंकि देश के लिए उन्हें पदक लाना होता है. पर पदक लाने के लिए बनायी गयी जिम्मेदार संस्था ‘आईओए’ ही अगर सुरेश कलमाड़ी और अभय चौटाला जैसे लोगों के हवाले हो जाए तो फिर भगवान ही मालिक है हमारे देश के खेलों का और उसके भरोसे पदक की आस लगाए सवा सौ करोड़ देशवासियों का!

खेल जंग हो जाये तो भारत माता को भी बाप बन जाना पड़ता है

पहले यह सब सोशल मीडिया के चुटकुलों से शुरू हुआ. बाप तो आखिर बाप होता है. मामला क्रिकेट का था तभी मामला इतना नॉन सीरियस था. कोई दूसरा स्पोर्ट्स या गेम होता तो स्थिति यह नहीं होती. क्रिकेट को हमने गेम कब रहने दिया है, यह तो मुहल्ले के श्वानों का युद्ध हो गया है, श्वान लड़ते रहते हैं और लोग हुलाते रहते हैं. अगर थोड़ी बेहतर उपमा दें तो मुर्गा लड़ाई कह सकते हैं. अंगरेज सर पीट रहे होंगे कि उनके जेंटलमैन गेम की एशिया पहुंचते-पहुंचते कैसी दुर्गति हो गयी है. मुमकिन है, बहुत जल्द यह डब्लू डब्लू एफ में न बदल जाये.

जाने दीजिये, मसला क्रिकेट का नहीं है. मसला हमारी भारत माता का है. जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी, वंदे मातरम, भारत माता ग्राम वासिनी जैसी साहित्यिक रचनाओं से होते हुए भारत माता की जय के मंचीय नारों तक यह मां ही है. मोदी जी के भाषणों की यह खासियत रही है कि वे आखिर में हर बार यह नारा जरूर लगाते हैं. मगर क्रिकेट के मैदान पर अब तक इंडिया-इंडिया के नारे ही लगते रहे हैं, भारत माता की जय के नारे कभी नहीं लगे.

इस बार नया नारा लगने वाला है, बाप-बाप करोगे… मतलब यह है कि वैसे तो हमारा मुल्क मां की भूमिका में ही रहता है. तभी यहां राष्ट्रपति होते हैं. मगर क्रिकेट के मैदान पर जब यह अपने एशियाई पड़ोसियों से भिड़ता है तो मां से बाप बन जाता है, दादा बन जाता है. लोग इसका लिंग परिवर्तन कर देते हैं. और यह कोई सोशल मीडिया का चुटकुला भर नहीं है. कमेंट्रेटर बोल रहे हैं, टीवी चैनलों पर इसी शीर्षक से प्रोग्राम चल रहे हैं. क्रिकेटप्रेमी राष्ट्रवादियों ने मान लिया है कि भारत मां नहीं बाप है. क्योंकि मां में कूटने का वह हुनर नहीं है, जो बाप में होता है. बाप अच्छी तरह धोती है, मां तो ममता दिखाती है.

हालांकि कई लोगों की राय इसके खिलाफ होगी कि मांएं ठीक से नहीं कूटतीं. कई माताएं पिताओं से बेहतर पिटाई करती हैं. मगर लैंगिक पूर्वाग्रह की वजह से वे दबी कुचली ही मानी जाती हैं. निरूपा राय टाइप. इसलिए क्रिकेट प्रेमी राष्ट्रवादियों ने भारत को बाप और दादा की पदवी दे रखी है. ठीक से कूटो बेटे और पोते को. सब सिखा दो. इस लिहाज से इसे कूटनीतिक छवि परिवर्तन माना जायेगा.

क्योंकि अगर भारत को यहां मां माना जाता तो पाकिस्तान को कहना पड़ता. मां-मां होती है, बेटा-बेटा होता है, या बेटी-बेटी होती है. पता नहीं पाकिस्तान वाले अपने मुल्क को पुल्लिंग मानते हैं या स्त्रीलिंग. लेकिन उस रूपक में वह दबंगई निखर कर नहीं आती जो इस बात में आती है कि बाप-बाप होता है और जब बाप से लड़ोगे तो बाप-बाप करोगे. मैंने सोशल मीडिया साइट्स पर पाकिस्तानियों के अपडेट्स नहीं देखे हैं कि वे इस फिकरे पर किस तरह रिएक्ट कर रहे हैं या बांग्लादेशियों ने भारत के खुद को उसका दादा घोषित करने पर किस तरह रिएक्ट किया.

मगर यह मैंने खूब सुना है कि बांग्लादेशी इस बात का बुरा मानते हैं कि भारत दक्षिण एशिया में बड़ा भाई बनने की कोशिश करता है. वह इस सच्चाई को स्वीकार नहीं करना चाहता कि उसके आसपास के मुल्क एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई हैं और उनके साथ समानता का व्यवहार करना चाहिये. कुछ दिनों से नेपाल भी इस बात से नाराज रहता है. खेल हो या विदेश नीति या फिर जंग ही, स्पर्धा अपनी जगह है, गरिमा अपनी जगह. कभी ऐसी परंपरा थी कि हम अपने प्रतिद्वंद्वियों का समुचित सम्मान करके मानवीय गरिमा का प्रदर्शन करते थे. आज भी खेलों में मुकाबला खत्म होने के बाद प्रतिद्वंद्वियों को एक दूसरे से हाथ मिलाने कहा जाता है.

मगर उस परंपरा में एक ठंडापन होता है. वह मैच रह जाता है, जंग में नहीं बदलता. क्रिकेट या ऐसे ही दूसरे खेलों से जुड़े व्यापारी जानते हैं कि अगर पैसे बनाना है तो दर्शकों को जुनूनी बनाना होगा और माहौल जंग का बनाना होगा. हर मुकाबले से पहले दोनों पक्षों के खिलाड़ियों, पूर्व खिलाड़ियों से ऐसे बयान दिलाये जाते हैं कि मैच-मैच न रहे, जंग में बदल जाये. इसके उन्हें पैसे भी दिये जाते होंगे. फिर एक आग लगाऊ टीवी प्रोमो तैयार किया जाता है. मैच आते-आते दर्शकों का खून उबाल मारने लगता है, अगर सामने पाकिस्तान हो तो जाहिर सी बात है, स्थितियां जंग जैसी बहुत आसानी से बन जाती है. और जब जंग लड़ना होता है तो भारत माता को भी बाप बन जाना पड़ता है!