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इस बार 14 दिनों तक ही कर सकेंगे पितरों के प्रति श्रद्धा अर्पण

वाराणसी। सनातनी परंपरा के तीन ऋणों में पितृ ऋण प्रमुख माना जाता है। पितरों को समर्पित आश्विन मास का कृष्ण पक्ष पितृ पक्ष कहा जाता है। इस बार आश्विन मास की शुरुआत 26 सितंबर से होगी मगर सनातन धर्म में किसी पक्ष की शुरुआत उदया तिथि के अनुसार मानी जाती है और श्राद्ध-तर्पण का समय मध्याह्न में होना आवश्यक माना जाता है।

इस लिहाज से पितृपक्ष का आरंभ 25 सितंबर से हो रहा है। खास यह है कि इस बार आश्विन कृष्ण पक्ष में षष्ठी तिथि की हानि से यह पक्ष 14 ही दिनों का होगा। ऐसे में द्वादशी और त्रयोदशी का श्राद्ध तर्पण छह अक्टूबर को किया जाएगा। सर्वपैत्री श्राद्ध अमावस्या व पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को मनाया जाएगा।

शास्त्रीय मान्यता

जिन माता-पिता ने हमारी आयु, आरोग्य और सुख, सौभाग्य आदि की अभिवृद्धि के लिए अनेक प्रयत्न व प्रयास किए, उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा जन्म ग्रहण करना निरर्थक है। उनके ऋण उतारने में कोई ज्यादा खर्च भी नहीं होता। केवल वर्ष भर में उनकी मृत्यु तिथि को सर्व सुलभ जल, तिल, यव, कुश और पुष्प आदि से उनका श्राद्ध संपन्न करने के साथ ही गो ग्रास देकर एक, तीन या पांच ब्राह्माणों को भोजन करा देने मात्र से ऋण उतर जाता है।

यह है विधान

ज्योतिषाचार्य ऋषि द्विवेदी के अनुसार, पितृ पक्ष में नदी तट पर विधिवत तर्पण तथा मृत्यु तिथि पर अपने पूर्वजों के श्राद्ध में ब्राह्माणों को भोजन श्रद्धा के साथ करवाकर पितरों को तृप्त व प्रसन्न किया जाता है। मृत्यु तिथि पर अपने पितरों को याद कर उनकी स्मृति में योग्य ब्राह्माण को श्रद्धा पूर्वक इच्छा भोजन करा के दान-दक्षिणा देते हुए संतुष्ट करना चाहिए। पितृ विसर्जन के दिन रात्रि में मुख्य द्वार पर दीपक जलाकर पितृ विसर्जन किया जाता है। यदि उन्हें यह उपलब्ध नहीं होता है, तो वे श्राप दे कर चले जाते हैं।

तिथि विशेष

प्रतिपदा का श्राद्ध 25 सितंबर, द्वितीया का श्राद्ध 26 सितंबर, तृतीया का श्राद्ध 27 सितंबर, चतुर्थी का श्राद्ध 28 सितंबर, पंचमी का श्राद्ध 29 सितंबर, षष्ठी का श्राद्ध 30 सितंबर, सप्तमी का श्राद्ध, एक अक्टूबर, अष्टमी का श्राद्ध दो अक्टूबर, नवमी का श्राद्ध तीन अक्टूबर, दशमी का श्राद्ध चार अक्टूबर, एकादशी का श्राद्ध पांच अक्टूबर, द्वादशी व त्रयोदशी का श्राद्ध छह अक्टूबर, चतुर्दशी का श्राद्ध सात अक्टूबर और पितृ विसर्जन आठ अक्टूबर को किया जाएगा।

 

क्षमा प्रार्थना के मंत्र के साथ, ऐसे करें गणेश प्रतिमा का विसर्जन

मल्टीमीडिया डेस्क। गणेश महोत्सव पूरे देश में धूम-धाम से मनाया जा रहा है। इसके साथ ही अब समय आ रहा है, जब गणेश जी का विसर्जन किया जाएगा। 10 दिनों तक हमारे घरों में विराजित रहने के बाद अब उन्हें विसर्जित किया जाएगा। मगर, कई लोगों को शायद यह जानकारी नहीं होगी कि विसर्जन के लिए क्या किया जाए।

सबसे पहले तो यह जान लें कि गणेशजी की विदाई की तैयारी वैसे ही करनी चाहिए जैसे घर से किसी व्यक्ति के यात्रा पर जाने के समय तैयारी की जाती है। सबसे पहले आरती और पूजन कर विशेष प्रसाद का भोग लगाएं। 

इसके बाद श्री गणेश का स्वस्तिवाचन करें। एक स्वच्छ पाटा लेकर उस पर स्वास्तिक का चिह्न बनाकर उस पर अक्षत रखें। इस पर एक साफ वस्त्र बिछाएं। पाटे के चारों कोनों पर चार सुपारी रखें।

गणेश प्रतिमा को उनकी स्थापना वाले स्थान से जयकारा लगाते हुए उठाकर उन्हें इस पाटे पर विराजित करें। फल, फूल, वस्त्र, दक्षिणा, लड्डू, मोदक रखें। इसके एक छोटी लकड़ी पर चावल, गेहूं, पंच मेवा की पोटली और यथाशक्ति दक्षिणा रखकर उसे बांधकर नदी या तालाब के विसर्जन स्थल तक ले जाएं। 

विसर्जन से पहले गणेशजी की फिर से आरती करें। श्री गणेश से खुशी-खुशी बिदाई करें और उनसे धन, सुख, शांति, समृद्धि का आशीर्वाद मांगे। साथ ही गणेश स्थापना से लेकर विसर्जन तक यदि जाने-अनजाने में कोई गलती हुई है, तो उसके लिए क्षमा प्रार्थना भी करें।

इसके बाद गणेश प्रतिमा को पूरे आदर और सम्मान के साथ वस्त्र और समस्त सामग्री के साथ धीरे-धीरे बहाएं।

24 सितंबर से शुरू हो रहे हैं श्राद्ध पक्ष, जानिए देश में कहां-कहां होता है पिंडदान

मल्टीमीडिया डेस्क। 24 सितंबर से श्राद्ध पक्ष शुरू हो रहे हैं। श्राद्ध का अर्थ है, अपने पितरों के प्रति श्रद्धा प्रगट करना। पुराणों के अनुसार, मृत्यु के बाद भी जीव की पवित्र आत्माएं किसी न किसी रूप में श्राद्ध पक्ष में अपनी परिजनों को आशीर्वाद देने के लिए धरती पर आते हैं। पितरों के परिजन उनका तर्पण कर उन्हें तृप्त करते हैं।

ऐसी मान्यता है कि आश्विन कृष्ण पक्ष के 15 दिनों में (प्रतिपदा से लेकर अमावस्या) तक यमराज पितरों को मुक्त कर देते हैं और समस्त पितर अपने-अपने हिस्से का ग्रास लेने के लिए अपने वंशजों के समीप आते हैं, जिससे उन्हें आत्मिक शांति प्राप्त होती है। 

मान्यताओं के अनुसार, मरने के बाद पिंडदान करना आत्मा को मोक्ष की प्राप्ति कराता है। पिंडदान करने का सबसे ज्यादा महत्व बिहार के गया का है। इसी जगह पर भगवान राम ने राजा दशरथ का पिंडदान किया था। हालांकि, इसके अलावा देश में कुछ अन्य जगहों पर भी पिंडदान किया जाता है।

पितृ पक्ष के दौरान यहां हजारों की संख्या में लोग अपने पितरों का पिण्डदान करते है। मान्यता है कि यदि इस स्थान पर पिण्डदान किया जाय, तो पितरों को स्वर्ग मिलता है। माना जाता है कि स्वयं विष्णु यहां पितृ देवता के रूप में मौजूद हैं, इसलिए इसे पितृ तीर्थ भी कहा जाता है। चार प्रमुख धामों में से एक बद्रीनाथ के ब्रहमाकपाल क्षेत्र में तीर्थयात्री अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान करते हैं। कहा जाता है कि पाण्डवों ने भी अपने पितरों का पिंडदान इसी जगह किया था। तीर्थराज प्रयाग में तीन प्रमुख नदियां गंगा, यमुना और सरस्वती का संगम होता है। पितृपक्ष में बड़ी संख्या में लोग यहां पर अपने पूर्वजों को श्राद्ध देने आते है। 

काशी, यूपी 

 

 

कहते हैं कि काशी में मरने पर मोक्ष मिलता है। यह जगह भगवान शिव की नगरी माना जाता है। काशी में पिशाचमोचन कुंड पर श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। यहां अकाल मृत्यु होने पर पिंडदान करने पर जीव आत्मा को मोक्ष मिलता है।

 

सिद्धनाथ, एमपी

उज्जैन में शिप्रा नदी के किनारे स्थित सिद्धनाथ में लोग पितरों को श्राद्ध अर्पित करते हैं। कहा जाता है कि यहां माता पार्वती ने वटवृक्ष को अपने हाथों से लगाया था।

 

पिण्डारक, गुजरात

गुजरात के द्वारिका से 30 किलोमीटर की दूरी पर पिण्डारक में श्राद्ध कर्म करने के बाद नदी मे पिण्ड डालते हैं।लोग यहां अपने पितरों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध कर्म करते हैं।

बिना मेहनत के कैसे पाएं सब कुछ

गिरीशचंद्र घोष बांग्ला के प्रसिद्ध कवि-नाटककार थे। उनके एक धनी मित्र थे, जो अपनी रईसी अपने व्यवहार में भी दिखाते थे। वह कहीं जाते तो उनका नौकर उनके लिए चांदी के बर्तन साथ लेकर चलता था, ताकि वह अपना खाना उन्हीं में खाएं। घोष जी को यह बात अच्छी नहीं लगती थी पर वह मित्र का दिल नहीं दुखाना चाहते थे। फिर उन्होंने तय किया कि वह उसकी इस आदत को सुधार कर रहेंगे।

एक दिन घोष जी ने अपने रईस दोस्त को खाने पर आमंत्रित किया। हमेशा की तरह उनके मित्र अपने नौकर के साथ पहुंचे। नौकर बर्तन लेकर आया था। लेकिन घोष जी अपने मित्र के आते ही उन्हें और लोगों के बीच ले गए। जब तक मित्र कुछ समझ पाते, तब तक उनके सामने पत्तल में खाना परोस दिया गया। बाकी लोगों के सामने भी पत्तल में खाना रखा था। 

उनके रईस मित्र संकोच में पड़ गए। उन्होंने नौकर को आवाज देनी चाही लेकिन तब तक सब लोग खाने लगे और उनसे भी खाने का अनुरोध करने लगे। मन मसोस कर उन्हें भी पत्तल में खाना पड़ा। खाने के बाद जैसे ही वह उठे तो घोष जी उनके बर्तनों में व्यंजन लेकर उनके सामने हाजिर हुए।

उन्होंने हंसते हुए मित्र से कहा, ‘‘क्षमा करें, थोड़ी गलतफहमी हो गई। जब तुम्हारे नौकर को घर की महिलाओं ने बर्तन लेकर आते देखा तो उन्हें लगा कि शायद तुम अपने बच्चों के लिए खाना ले जाना चाहते हो। उन्होंने इसमें खाना दे दिया है।’’ 

मित्र लज्जित होकर चले गए। उन्हें अपनी गलती का अहसास हो गया। उन्होंने दिखावा करना छोड़ दिया। 

तात्पर्य यह कि धन का दिखावा बहुत ही निम्न श्रेणी के लोग करते हैं। भले ही वे धन का दिखावा कर स्वयं संतुष्ट हो जाते हैं, पर समाज उन्हें इस तुच्छ बात के लिए नकार देता है, जैसा कि गिरीशचंद्र घोष जी के धनवान मित्र के साथ हुआ। अगर कुछ दिखाना ही है तो लोगों के प्रति परोपकारी रहो, ताकि आपका यश चारों तरफ गूंजे।

छोटी सी इलायची के बड़े कमाल

छोटी सी इलायची भोजन में सुगन्ध और स्वाद बढ़ाने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक है। क्या आप जानते हैं इलायची केवल जायका बढ़ाने में ही नहीं बल्कि व्यक्ति के बंद भाग्य के भी सभी रास्ते खोलने में मदद करती है। तो आईए आज हम आपको इलायची के कुछ एेसे प्रभावी उपायों के बारे में बताएं, जो किसी की भी डूबती नैय्या को पार लगा सकते हैं।  यदि बहुत मेहनत करने के बाद भी जीवन में सफलता प्राप्त न हो तो हरे कपड़े में एक इलायची बांधकर रात में तकिए के नीचे रखें और सुबह उठकर किसी बाहरी व्यक्ति को दे दें। इस उपाय से सफलता के बीच आने वाली समस्त रूकावटों का अंत होता है।  पैसों की तंगी से छुटकारा पाने के लिए अपने पर्स या फिर जेब में पांच इलायची जरूर रखें। यह उपाय पैसे की सभी परेशानियों को दूर करने में मददगार साबित होता है।  सुंदर जीवन साथी पाने के लिए एक पीले कपड़े में 5 इलायची डालकर किसी गरीब को दान करें।  वैवाहिक जीवन में मधुरता बनाए रखने के लिए रात को सोने से पहले इलायची को दूध में उबालकर पीना चाहिए।  परीक्षा में अच्छे नंबर पाने के लिए एक छोटी इलायची को दूध में उबालकर किसी गरीब बच्चे को कम से कम 7 सोमवार तक पिलाएं। ऐसा करने से छात्रों का पढ़ाई में मन लगेगा, अकाग्रता बढ़ेगी और बुद्धि तेज होगी।

सोमवार का गुडलक: दूर होगी घर-परिवार से दरिद्रता

सोमवार दिनांक. 30.04.18 को वैशाख के अंतिम दिन वैशाख पूर्णिमा के दिन सत्यविनायक पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। वैशाख पूर्णिमा के दिन में पवित्र सरिताओं में मुख्यतः नर्मदा, शिप्रा व गंगा नदी में प्रातः काल में स्नान करने का शास्त्रों में विधान है। जिससे सब पापों से निवृत्ती मिलती है। पद्म पुराण के अनुसार वैशाख मास में प्रात: स्नान करने पर अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। इस दिन मिष्ठान, सत्तू, जलपात्र, वस्त्र दान करने व पितृ तर्पण करने से बहुत पुण्य प्राप्ति होती है। वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु के नवे अवतार बुद्ध का जन्म हुआ था। इस पूर्णिमा को सत्यविनायक पूर्णिमा भी कहते हैं।


श्रीकृष्ण के बचपन के दरिद्र मित्र ब्राह्मण सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने उनको सत्यविनायक व्रत का विधान बताया था। इसी व्रत के प्रभाव से सुदामा की दरिद्रता दूर हुई थी व सुदामा सर्वसुख सम्पन्न व ऐश्वर्यशाली हो गए थे। इस दिन यमराज व चित्रगुप्त की पूजा करने का विधान है। इस व्रत से यमराज की प्रसन्नता से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन यमराज के निमित्त जलपूर्ण कलश व पकवान दान करने से गोदान के समान फल मिलता है। पांच ब्राह्मणों को मीठे तिल दान देने से सब पापों का क्षय होता है। इस दिन पानी में तिल मिलाकर स्नान किया जाता है। घी, चीनी व तिलों से भरा पात्र भगवान सत्यनारायण को चढ़ाया जाता है। घी, चीनी व तिलों से अग्नि में आहुति दी जाती है। तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है। तिल घी व शहद का तर्पण किया जाता है। इस दिन भगवान सत्यनारायण का व्रत करने से सब प्रकार के सुख, सम्पदा और श्रेय की प्राप्ति होती है, सर्व कार्यों में जीत मिलती है, सर्व रोगों का नाश होता है, पारिवारिक संबंध सुदृढ़ होते हैं।

   
पूजन विधि: घर की उत्तर दिशा में सफ़ेद कपड़ा बिछाकर दो कलश स्थापित करें। पीतल का कलश भगवान नारायण के लिए और स्टील का कलश यमराज के लिए। जल भरे पीतल व स्टील के कलश पर नारियल रखकर दोनों का दशोंपचार पूजन करें। केसर मिले गौघृत का दीप करें, चंदन से धूप करें, सफ़ेद व पीले रंग के फूल चढ़ाएं, चंदन से तिलक करें, दूध-शहद चढ़ाएं। घी, तिल व शहद अर्पित करें व मावे की मिठाई का भोग लगाएं तथा 1-1 माला इन विशिष्ट मंत्रों को जपें। पूजन के बाद सामाग्री ब्राह्मणों को दान करें।

सत्यविनायक पूर्णिमा: यमराज देंगे अकाल मृत्यु से मु्क्ति का वरदान

 वैशाख के अंतिम दिन वैशाख पूर्णिमा के दिन सत्यविनायक पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। वैशाख पूर्णिमा के दिन में पवित्र सरिताओं में मुख्यतः नर्मदा, शिप्रा व गंगा नदी में प्रातः काल में स्नान करने का शास्त्रों में विधान है। जिससे सब पापों से निवृत्ती मिलती है। पद्म पुराण के अनुसार वैशाख मास में प्रात: स्नान करने पर अश्वमेध यज्ञ के समान फल मिलता है। इस दिन मिष्ठान, सत्तू, जलपात्र, वस्त्र दान करने व पितृ तर्पण करने से बहुत पुण्य प्राप्ति होती है। वैशाख पूर्णिमा के दिन ही भगवान विष्णु के नवे अवतार बुद्ध का जन्म हुआ था। इस पूर्णिमा को सत्यविनायक पूर्णिमा भी कहते हैं।श्रीकृष्ण के बचपन के दरिद्र मित्र ब्राह्मण सुदामा जब द्वारिका उनके पास मिलने पहुंचे तो श्रीकृष्ण ने उनको सत्यविनायक व्रत का विधान बताया था। इसी व्रत के प्रभाव से सुदामा की दरिद्रता दूर हुई थी व सुदामा सर्वसुख सम्पन्न व ऐश्वर्यशाली हो गए थे। इस दिन यमराज व चित्रगुप्त की पूजा करने का विधान है। इस व्रत से यमराज की प्रसन्नता से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। इस दिन यमराज के निमित्त जलपूर्ण कलश व पकवान दान करने से गोदान के समान फल मिलता है। पांच ब्राह्मणों को मीठे तिल दान देने से सब पापों का क्षय होता है। इस दिन पानी में तिल मिलाकर स्नान किया जाता है। घी, चीनी व तिलों से भरा पात्र भगवान सत्यनारायण को चढ़ाया जाता है। घी, चीनी व तिलों से अग्नि में आहुति दी जाती है। तिल के तेल का दीपक जलाया जाता है। तिल घी व शहद का तर्पण किया जाता है। इस दिन भगवान सत्यनारायण का व्रत करने से सब प्रकार के सुख, सम्पदा और श्रेय की प्राप्ति होती है, सर्व कार्यों में जीत मिलती है, सर्व रोगों का नाश होता है, पारिवारिक संबंध सुदृढ़ होते हैं।

  पूजन विधि: घर की उत्तर दिशा में सफ़ेद कपड़ा बिछाकर दो कलश स्थापित करें। पीतल का कलश भगवान नारायण के लिए और स्टील का कलश यमराज के लिए। जल भरे पीतल व स्टील के कलश पर नारियल रखकर दोनों का दशोंपचार पूजन करें। केसर मिले गौघृत का दीप करें, चंदन से धूप करें, सफ़ेद व पीले रंग के फूल चढ़ाएं, चंदन से तिलक करें, दूध-शहद चढ़ाएं। घी, तिल व शहद अर्पित करें व मावे की मिठाई का भोग लगाएं तथा 1-1 माला इन विशिष्ट मंत्रों को जपें। पूजन के बाद सामाग्री ब्राह्मणों को दान करें।

आज सूर्य बदलेंगे घर, कौन होगा बेघर

 रात 12 बजे सूर्यदेव भरणी नक्षत्र में प्रविष्ट करने जा रहे हैं। 11 मई की शाम 06:13 तक यहीं पर वास करेंगे। सूर्य के घर बदलने का प्रभाव हर नामाक्षर और नक्षत्र वाले व्यक्तियों पर होगा। आईए जानें आपके नामाक्षर पर क्या शुभ प्रभाव पड़ेगा और अशुभता से बचने के लिए क्या करना होगा-


भरणी, कृतिका और रोहिणी नक्षत्र में जन्मे जातक या जिनका नाम ल, अ, ई, उ, ए और व अक्षर से शुरू होता है, उन्हें 11 मई तक ज्वलंतशील चीजों से दूरी बनाकर रखनी चाहिए अथवा उनका उपयोग करते हुए बेहद सतर्कता रखने की जरूरत है। यदि कोई नई प्रॉपर्टी लेने की सोच रहे हैं तो 11 मई तक इंतजार करें। सूर्य के अशुभ प्रभाव से बचने के लिए 11 मई तक हर रोज सुबह घर के सभी खिड़कियां और दरवाजें खोल दें, जिससे सूर्य की सकारात्मकता घर में प्रवेश करेगी। कुछ देर के लिए सूर्य की रोशनी में भी बैठें।


मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु और पुष्य नक्षत्र में जन्मे जातक या जिनका नाम व, क, घ, ङ, छ, ह और ड से आरंभ होेता है। उनके मिजाज कुछ बिगड़े-बिगड़े रहेंगे, बोरियत के चलते किसी काम में मन नहीं लगेगा। समय पर कोई भी काम पूरा नहीं कर पाएंगे। इस अशुभता से बचने के लिए रात को सोने से पहले अपने पिलो के पास 5 मूली या 5 बादाम रखें। सुबह शुद्ध होकर मूली-बादाम किसी भी धार्मिक स्थान पर रख आएं।

शनिवार का गुडलक: नृसिंह जयंती पर होगा हर दुख का अंत

शनिवार दिनांक 28.04.18 को वैसाख शुक्ल चतुर्दशी के उपलक्ष्य में नृसिंह जयंती पर्व मनाया जाएगा। विष्णु पुराण के अनुसार विष्णु के प्रमुख दस अवतारों में से नृसिंह देव चौथा अवतार माने जाते हैं। इस अवतार में भगवान विष्णु आधे मनुष्य अर्थात नर व आधे शेर अर्थात सिंह के रूप में अवतरित हुए थे। शास्त्रनुसार कश्यप ऋषि व उनकी दैत्य पत्नी दिति के दो पुत्र हिरण्याक्ष व हिरण्यकश्यप थे। विष्णु के वराह अवतार में हरिण्याक्ष के वध से क्रोधित हिरण्यकश्यप ने भाई की मृत्यु का बदला विष्णु जी से लेने के लिए ब्रह्मदेव का कठोर तप करके उनसे अजय होने का वरदान प्राप्त किया और स्वर्ग पर अधिपत्य स्थापित करके तीनों लोकों पर स्वामित्व बना लिया। हिरण्यकश्यप अपनी शक्ति के अहंकार में प्रजा पर भी अत्याचार करने लगा।


हिरण्यकश्यप का पुत्र प्रह्लाद अपने पिता से पूर्णतः अलग था। वो बचपन से ही विष्णु भगवान का भक्त था। हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद का मन विष्णु भगवान की भक्ति से हटाने का बहुत प्रयास किया परंतु असफल रहा। क्रोधित हिरण्यकश्यप ने एक द्वार से सटे खंबे से प्रह्लाद को बांधकर खंबे पर अपने गदा से प्रहार किया। तभी खंभे को चीरकर नृसिंह देव प्रकट हुए और हिरण्यकश्यप को उठाकर महल की दहलीज पर ले आए। नृसिंह भगवान ने उसे अपनी गोद में लिटाकर अपने नाखूनों से उसका सीना चीरकर वध कर दिया। वध का स्थान न दहलीज था न घर के भीतर था, न बाहर, नृसिंह जी की गोद थी। न धरती थी न ही आकाश, उस समय गोधुलि बेला थी यानी न दिन था और न रात। नृसिंह जी आधे मानव व आधे पशु थे, नृसिंह जी के नाखून थे, न अस्त्र और न ही शस्त्र था। अतः यह दिन नृसिंह जयंती के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवान नृसिंह के निमित व्रत पूजन व उपाय से सर्व मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, समस्त दुखों का निवारण होता है तथा दुर्घटनाओं से सुरक्षा मिलती है। 


पूजन विधि: घर के पश्चिम में नीले कपड़े पर नृसिंह देव का चित्र स्थापित करके पंचोपचार पूजन करें। सरसों के तेल का दीपक करें, लोहबान धूप करें, बरगद के पत्ते चढ़ाएं, काजल चढ़ाएं, नारियल, बादाम व मिश्री चढ़ाएं, उड़द की खिचड़ी का भोग लगाएं व एक माला इस विशिष्ट मंत्र की जपें। पूजन के बाद भोग को पीपल के नीचे रख दें।

ईश्वर को पाने का चमत्कारी मंत्र

शास्त्रों के अनुसार गायत्री मंत्र एक एेसा महामंत्र है जिसकी मान्यता ॐ के समान मानी जाती है। यह मंत्र सफलता प्रदान करने वाला माना गया है। इस मंत्र की उपासना से जो फल प्राप्त होता है, उसका शब्दों में वर्णन करना सम्भव नहीं है। गायत्री मंत्र 24 अक्षरों का होता है, इसलिए इसे 24 वर्णीय मंत्र कहा जाता हैं। वेदों व शास्त्रों में कहा गया है कि गायत्री मंत्र का जाप करने से व्यक्ति के जीवन की हर समस्या का अंत हो जाता है। 


गायत्री मंत्र
'ऊं भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्' 


वेदों में गायत्री मंत्र के जप के लिए तीन समय बताए गए हैं। इसके अनुसार सूर्योदय से थोड़ी देर पूर्व मंत्र का जाप शुरू कर देना चाहिए। फिर दोपहर में भी गायत्री मंत्र का जाप किया जा सकता है। 


तीसरा समय शाम सूर्यास्त के कुछ देर पूर्व मंत्र जाप शुरू करके सूर्यास्त के कुछ देर बाद तक जप किया जा सकता है। 


किसी आकस्मिक काम के कारण जाप में बाधा आने पर हाथ-पैर धोकर फिर से जाप करें। इन तीनों समय के अतिरिक्त मौन रहकर या मानसिक रूप से भी जाप कर सकते हैं क्योंकि गायत्री मंत्र का जाप तेज आवाज में नहीं किया जाता।


इस मंत्र के नियमित जप से त्वचा में चमक आती है। आंखों की रोशनी बढ़ती है। सिद्धि प्राप्त होती है। गुस्सा शांत होता है। ज्ञान की वृद्धि होती है। कामों में आ रही रुकावटें दूर होने लगती है और कामयाबी मिलने लगती है।

इस मंत्र के निरंतर जाप से व्यापार तथा नौकरी में हो रहे नुकसान से छुटकारा मिलता है। 


यह मंत्र चौबीस अक्षर का है इसलिए इसे चौबीस शक्तियों-सिद्धियों का प्रतीक माना गया है। जिस कारण शास्त्रों में इसे सभी प्रकार की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला बताया है।


छात्रों के लिए यह मंत्र बहुत ही फलदायी माना गया है। यदि किसी विद्यार्थी का मन पढ़ाई आदि में न लगता हो तो उसे 108 बार इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे विद्यार्थी के मन में एकाग्रता पैदा होने लगती है। 


स्वामी विवेकानंद ने भी कहा है कि गायत्री सदबुद्धि का मंत्र है, इसलिए उसे मंत्रों का मुकुटमणि कहा गया है।

ये बात पीठ में खंजर नहीं घुपवाएगी

चाणक्य की ही तरह आचार्य शुक्राचार्य भी एक प्रसिद्ध नीतिकार थे। फ़र्क सिर्फ इतना है कि शुक्राचार्य को दैत्यों का गुरु माना जाता था। परंतु वह अपने समय के प्रचंड विद्वानों और समस्त धर्म ग्रंथों के ज्ञाता थे। उनके द्वारा कही गई बातें शुक्र नीति में दर्ज हैं जिनमें मनुष्य की हर समस्या का हल छुपा है।


तो आईए जानते हैं, इनके द्वारा बताई गई एेसी बातें जो यदि इंसान अपने पल्ले बांध ले, तो वह सभी परेशानियों से मुक्त हो जाता है। 

श्लोक
दीर्घदर्शी सदा च स्यात, चिरकारी भवेन्न हि। 
अर्थ
भविष्य की सोचें, लेकिन भविष्य पर न टालें। 


भावार्थ- मनुष्य को अपना प्रत्येक कार्य भविष्य को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। यानि उसे ध्यान रखना चाहिए कि आज वह जो भी कार्य कर रहा है, उसका भविष्य में क्या परिणाम होगा। साथ ही जो काम आज करना है, उसे आज ही करें। आलस्य करते हुए उसे अपने किसी भी काम को भविष्य पर न टालें।

श्लोक
यो हि मित्रमविज्ञाय यथातथ्येन मन्दधिः।
मित्रार्थो योजयत्येनं तस्य सोर्थोवसीदति।।

अर्थ
मित्र बनाते समय सावधानी रखें 


भावार्थ- बिना सोचे-समझे किसी से भी मित्रता कर लेना, कई बार हानिकारक हो सकता है, क्योंकि मित्र के गुण-अवगुण, उसकी अच्छी-बुरी आदतें हम पर समान रूप से असर डालती हैं। इसलिए बुरे विचारों वाले या बुरी आदतों वाले लोगों से मित्रता नहीं करनी चाहिए।

 

श्लोक
नात्यन्तं विश्वसेत् कच्चिद् विश्वस्तमपि सर्वदा। 
अर्थ
हद से ज्यादा किसी पर भरोसा न करें 


भावार्थ- शुक्र नीति के अनुसार किसी व्यक्ति पर विश्वास करना ठीक है लेकिन अंधविश्वास करना उचित नहीं होता। शुक्राचार्य ने यह स्पष्ट कहा है कि किसी भी व्यक्ति पर हद से ज्यादा विश्वास करना घातक हो सकता है। कई लोग ऊपर से आपके भरोसेमंद होने का दावा करते हैं लेकिन भीतर ही भीतर आपसे बैर भाव रख सकते हैं। 


श्लोक
अन्नं न निन्घात्।।
अर्थ
अन्न का अपमान कभी न करें
 

भावार्थ- अन्न प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का आधार होता है, इसलिए जो भी भोजन आपको प्रतिदिन के आहार में प्राप्त हो उसे परमात्मा का प्रसाद समझते हुए ग्रहण करें। शास्त्रों में वर्णित है कि अन्न का अपमान करने वाला मनुष्य नर्क में घोर पीड़ा भोगता है।

 

श्लोक
धर्मनीतिपरो राजा चिरं कीर्ति स चाश्रुते।
अर्थ
मनुष्य को सम्मान धर्म से प्राप्त होता है


भावार्थ- जो मनुष्य अपने धर्म में बताए अनुसार जीवनयापन करता है, उसे कभी पराजय का सामना नहीं करना पड़ता। धर्म ही मनुष्य को सम्मान दिलाता है। इसलिए कभी भी अपने धर्म का अपमान नहीं करना चाहिए। 

गुरुवार का गुडलक: एक हजार गौदान का फल पाएं

गुरुवार दिनांक 26.04.18 को वैसाख शुक्ल एकादशी के उपलक्ष्य में मोहिनी एकादशी का पर्व मनाया जाएगा। इस एकादशी में स्नान करने के लिए कुश व तिल के लेप का प्रयोग करते हैं। इस दिन श्री हरि के मोहिनी स्वरूप के पूजन का विधान है। सीता की खोज करते समय श्री राम ने भी इस व्रत को किया था। श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को मोहिनी एकादशी की कथा कही व यही कथा महर्षि वशिष्ठ ने श्री रामचंद्र जी से कही थी।

 

जिसके अनुसार सरस्वती के तट पर भद्रावती नगरी में चंद्रवंशी राजा "द्युतिमान" के राज्य में धनपाल नामक अत्यंत धर्मालु वैश्य रहता था। धनपाल के पांच पुत्र थे परंतु सबसे छोटा पांचवा पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह पितृ आदि को नहीं मानकर कुकर्मों में लिप्त होकर पिता के धन को नष्ट करता था, इसी कारण धनपाल ने उसे घर से निकाल दिया था। भूख-प्यास से अति दु:खी होकर वो चोरी करने लगा और पकड़ा गया। राजा ने उसे नगर निकाला दे दिया। वह वन में बहेलिया बनकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा। एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुंचा, जहां ऋषि गंगा में स्नान कर आ रहे थे। ऋषि के भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई।

 

उसने कौडिन्य से हाथ जोड़कर अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा जिस पर ऋषि ने उसे मोहिनी एकादशी का विधिवत व्रत करने का आदेश दिया। धृष्टबुद्धि ने ऋषि के निर्देश का पालन किया जिससे उसके सब पाप नष्ट हो गए। मोहिनी एकादशी के विधिवत पूजन, व्रत व उपाय से निंदित कर्मों से छुटकारा मिलता है, मोह बंधन से मुक्ति मिलती है, एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है। पैसे की कमी दूर होती है, पारिवारिक कलह से मुक्ति मिलती है व रोजगार में वृद्धि होती है। 

 

पूजन विधि: घर के ईशान कोण में पीले कपड़े पर पीतल के कलश में जल और पीपल के 11 पत्ते रखकर उस पर श्रीराम का चित्र स्थापित कर विधिवत पूजन करें। गाय के घी में हल्दी मिलाकर दीप जलाएं, चंदन से धूप करें, पीले फूल चढ़ाएं, केसर से तिलक करें व 11 केले का भोग लगाएं तथा किसी माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें। पूजन के बाद केले पीली आभा लिए गाय को खिला दें।