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वास्तु-फेंगशुई: घर में न लगाएं ये फूल, कभी उन्नति नहीं कर पाएगा परिवार

फूलों से मानसिक असंतुलन को संतुलित किया जा सकता है क्यों कि यह प्रेम के प्रतीक होते हैं। फिर चाहे फूल कृत्रिम ही क्यों न हों? यह जीवन में सक्रियता को बढ़ावा देते हैं। यह नकारात्मक ऊर्जा को दूर करने में सहायक होते हैं। फूल मन को सुगंध देते हैं इसके अलावा भी घर के वास्तु में भी सहायक हैं।

लाल रंग के फूल दक्षिण दिशा और पीले रंग के फूल दक्षिण-पश्चिम या उत्तर-पूर्व में होना चाहिए। ऐसा होने पर व्यक्ति उत्साहित रहता है।

ताजे फूल शयन कक्ष में नहीं रखना चाहिए। सूखे फूलों को गुलदस्ते में से निकाल देना चाहिए। गुलदस्ते में फूल ताजे ही लगाएं। इसे दक्षिण में ही रखें। ऐसा करने से आपको सम्मान की प्राप्ति होती है।

परिवार के सदस्यों के बीच संबंध सुधारने के लिए बैंगनी रंग के, बैंगनी गुलदस्ते में अग्नि कोण (संबंध क्षेत्र) में रखना ठीक रहता है। ध्यान रखें फूल अगर सूख जाएं तो इन्हें निकाल कर ताजे फूलों का उपयोग ही करना चाहिए।


फूल पौधे के तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं। लकड़ी तत्व का अर्थ है। विकास, उन्नति, फैलाव आदि। इसलिए ताजे फूलों को व्यवसाय या कार्यालय में रखना पसंद करते हैं। इसके नकारात्मक ऊर्जा संतुलित रहती है।

विज्ञान कहता है कि ताजे फूल वातावरण को शुद्ध करते हैं। ये दरवाजे के पास रखे होना चाहिए। जिससे दरवाजे से सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश होती है।

बोनसाई पौधे भले ही खूबसूरत हों पर इन्हें घर में नहीं रखना चाहिए। अगर इन्हें रखते हैं तो घर के अंदर के विकास को रोक देते हैं। इसलिए इनका उपयोग वास्तु और फेंगशुई दोनों में ही वर्जित माना गया है।

विवाह उपरांत कई वर्ष इसी स्थान पर रहे थे शिव-पार्वती

हिन्दू धर्म में भगवान शिव की ही प्रतिमा एवं लिंग रूप में पूजा की जाती है। शिवलिंग को सृष्टि की सर्वव्यापकता का प्रतीक माना जाता है इसलिए देवों के देव भगवान शिव जी को समस्त जगत का स्वामी कहा जाता है। देश-विदेश में भगवान भोलेनाथ के कई प्राचीन मंदिर स्थापित हैं, ऐसा ही एक प्राचीन स्थान लुधियाना से 35 किलोमीटर दूर चंडीगढ़ रोड पर नीलों नहर पुल से आगे समराला से पहले गांव चहिलां में प्राचीन श्री मुक्तेश्वर महादेव शिव मंदिर (मुक्तिधाम) के नाम से विख्यात है। 


इस मंदिर के संबंध में प्रचलित प्राचीन कथा के अनुसार भगवान शंकर एवं माता पार्वती के विवाह उपरांत दोनों इसी स्थान पर कई वर्षों तक यहां रहे। यहां उन्होंने प्रथम युगल नृत्य किया। तत्पश्चात इन दोनों की युगल शक्ति इस धरती पर समा गई। तब माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि आने वाले समय में इस स्थान का क्या महत्व होगा। 


इस पर भगवान शिव ने कहा कि जो भी कोई यहां आकर अपने पापों की क्षमा मांगेगा, मैं उसके पाप नष्ट करके उसे मुक्ति प्रदान करूंगा। यह स्थान आने वाले समय में मुक्तिधाम के नाम से जाना जाएगा। भगवान भोलेनाथ ने कहा कि मैं इस मंदिर में निवास करके यहां आने वाले लोगों का उद्धार करूंगा। यहां मेरा शीश एवं जटाओं के रूप में एक शिवलिंग होगा। यहां वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और मैं खुद सदा विराजमान रहेंगे तथा यहां के सरोवर में स्नान करने वाले को सुख-शांति, समृद्धि प्राप्त होगी। 


यहां  स्थापित मूर्तियां अति प्राचीन बताई जाती हैं। इतिहास में इस जगह को मुक्ति मठ के नाम से जाना जाता है। यहां पहले बहुत सुंदर सरोवर थे, जिनके अवशेष अब भी देखने को मिलते हैं।  


मंदिर के पुजारी पंडित सुरेश ने बताया कि इस मंदिर में भगवान शंकर सबसे छोटे 3 इंच के शिवलिंग के रूप में विराजमान हैं। यहां भगवान शिव और पार्वती का स्थान होने के कारण भक्तों की हर मनोकामना पूर्ण होती है। सावन माह में यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। शिवलिंग को हर दिन कई प्रकार के सुगंधित फूलों से सजाया जाता है। 

डाक्यूमैंटरी फिल्म का प्रोमो आज रिलीज होगा

नया साल माता श्री चिन्तपूर्णी के साथ
होशियारपुर, (घुम्मण): भारत के प्रसिद्ध नारायणी आयुर्वैदिक ग्रुप के एम.डी. बलबीर शारदा ने खुशखबरी देते हुए बताया कि माता श्री चिन्तपूर्णी के भक्तों के लिए नए साल 2018 के शुभारंभ मौके माता चिन्तपूर्णी भवन की फूलों की सजावट की शूटिंग की गई है। उस डाक्यूमैंटरी फिल्म में सोशल वर्क एवं भंडारों के प्रबंधों का नजारा भी देखने को मिलेगा। उन्होंने बताया कि इस फिल्म का नया प्रोमो 18 जनवरी को रिलीज किया जा रहा है। यह फिल्म देश-विदेश में बसे माता के भक्तों के लिए एक सेवा के रूप मेें पेश की जी रही है। एम.डी. बलबीर शारदा ने बताया कि फिल्म को बृजेश ओबराय ने बहुत ही बढिया ढंग से डायरैक्ट किया है। इसमें 31 दिसंबर को माता जी के दरबार को सुंदर फूलों से सजाए जाने की डाक्यूमैंटरी फिल्म तैयार की गई है। इन खूबसूरत पलों व माता चिन्तपूर्णी जी के दर्शनों को इस फिल्म में संजोया गया है जिसको देखकर व माता श्री चिन्तपूर्णी के दर्शन करके सभी भक्त आनंदमय हों। उन्होंने माता जी के भक्तों को नए साल की शुभकामनाएं दीं और कहा कि नया साल सभी के लिए मंगलमय हो। नारायणी ग्रुप की ओर से जय माता दी।

नारद जी ने पूछा एेसा प्रश्न, जवाब सुन खुल गई आंखें

एक बार नारदजी भगवन विष्णु के पास पहुचें और उनसे कहने लगे कि भगवन धरती पर बहुत पाप बढ़ गया है अच्छे लोगों के साथ बुरा और बुरे लोगों के साथ अच्छा हो रहा कि ऐसा क्या हो गया कि आप इतने व्यथित है। जो आप कह रहे हैं उससे संबंधित अगर कोई घटना याद है तो बताइएे।

तब नारद जी ने उन्हें एक घटना सुनाई। नारद जी ने कहा "प्रभु आज सुबह मैंने देखा एक गाय दलदल में फंस गई, तभी उस ही रास्ते से एक चोर गुजर रहा था। उसने उस गाय को देखा दलदल में फंसा देखा तो, परंतु उसे बचाने के बजाय वो उसी के ऊपर पैर रख कर दलदल पार करके निकल गया। कुछ दूर जाने के बाद उसको सोने के जेवरों की थैली मिल गई।

फिर कुछ देर बाद उस ही रास्ते से एक साधु जा रहा था जब उसने गाय को देखा तो उससे रहा नहीं गया और उसने गाय को बड़ी यतन से कीचड़ से बाहर निकाल लिया। फिर कुछ दूर जाने के बाद वो साधु एक गड्ढे में गिर गया जिस से उसे काफी चोट भी आ गई, तो प्रभु ऐसा अन्याय क्यों। जिसने अच्छा काम किया उसके साथ उल्टा बुरा हुआ और जिसने बुरा किया उसके साथ अच्छा। 

तब विष्णु भगवान ने जो कहा, उसे सुनकर नारद जी आंखें खुल गई। भगवान ने कहा कि सुनो नारद उस चोर के भाग्य में  खजाना था लेकिन उसने उस गाय को दलदल से निकाल उसकी जान नहीं बचाई। इसलिए उसे स्वर्ण के कुछ मोहरे ही मिले। जबकि उस साधु की आज मृत्यु होनी लिखी थी। लेकिन उसने अपनी जान की परवाह न करते हुए उस गाय को दलदल से बागर निकाल कर उसके प्राण बचाएे। इसलिए उसे बस हल्की- फुल्की चोट आई। आगे भगवान ने नारदजी को समझाते हुए कहा कि कर्म का फल तो मिलता ही है, हां हो सकता है उसका माध्यम अलग हो लेकिन इंसान को उसके कर्मों का फल मिलता जरूर है।

जीवित है आज भी चिरंजीवी हनुमान

 

ऋषि मार्कण्डेय, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, ऋषि व्यास, विभिषण, बलि और परशुराम ये वो पौराणिक पात्र हैं जिन्हें हिंदू शास्त्रों में चिरंजीवी माना गया है। चिरंजीवी अर्थात अमरता का वर प्राप्त होना। जिन में से एक हनुमान जी भी है, जिन्हें अमरता का वरदान मां सीता से प्राप्त हुआ था। जब वें श्रीराम का संदेश लेकर माता सीता के पास पहुंचे थे, तब मां सीता ने उन्हें अमर होने का ये वर दिया था। मान्यताओं अनुसार कैलाश पर्वत से उत्तर दिशा की ओर एक जगह है, जहां हनुमान जी आज भी निवास करते हैं। हनुमान जी के इस निवास स्थल का वर्णन कई ग्रंथों और पुराणों में भी मिलता है।

गंधमादन पर्वत पर रहते हैं हनुमान
पुराणों के अनुसार, कलियुग में हनुमान जी गंधमादन पर्वत पर निवास करते हैं। एक कथा के अनुसार, अपने अज्ञातवास के समय हिमवंत पार करके पांडव गंधमादन के पास पहुंचे थे। एक बार भीम सहस्रदल कमल लेने के लिए गंधमादन पर्वत के वन में पहुंचें, तब उन्होंने हनुमान जी को वहां आराम करते देखा तो भीम ने उनसे अपनी पूंछ को मार्ग से हटाने के लिए कहा तो हनुमान जी ने कहा कि तुम स्वयं ही हटा लो लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूंछ हटा नहीं पाया था। 

गंधमादन पर्वत क्षेत्र और वन
शास्त्रों में बताया गया है कि गंधमादन पर्वत कैलाश पर्वत के उत्तर में स्थित है, जहां महर्षि कश्यप ने तपस्या की थी। इस पर्वत पर गंधर्व, किन्नरों, अप्सराओं और सिद्घ ऋषियों का निवास है। इसके शिखर पर किसी वाहन से पहुंचना असंभव माना जाता है।

वर्तमान में कहां हैं गंधमादन पर्वत
गंधमादन पर्वत हिमालय के कैलाश पर्वत से उत्तर दिशा की ओर है। यह पर्वत कुबेर के राज्यक्षेत्र में था। सुमेरू पर्वत की चारों दिशाओं में गजदंत पर्वतों में से एक को उस काल में गंधमादन पर्वत कहा जाता था। आज यह क्षेत्र तिब्बत के इलाके में है। इसी नाम से एक और पर्वत रामेश्वरम के पास भी स्थित है, जहां से हनुमान जी ने समुद्र पार करने के लिए छलांग लगाई थी।

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गंधमादन पर्वत पर बना मंदिर
गंधमादन पर्वत पर एक मंदिर भी बना हुआ है, जिसमें हनुमान जी के साथ ही श्रीराम आदि की भी मूर्तियां हैं विराजित हैं। कहते हैं इस पर्वत पर भगवान श्रीराम अपनी वानर सेना के साथ बैठ कर युद्ध के लिए योजना बनाया करते थे। लोक मान्यताओं अनुसार इस पर्वत पर भगवान राम के पैरों के निशान भी हैं।

रूका-रूका व्यापार चढ़ेगा परवान, मिलेंगे ढेरों लाभ

कम ही लोग जीवन में धनार्जन कर सफलता का स्वाद चख पाते हैं। धनार्जन ही सफलता का सबसे सटीक मार्ग है। देवगुरु बृहस्पति समृद्धि के देवता हैं। कुण्डली में बृहस्पति की अच्छी स्थिति व्यक्ति को समृद्धि के मार्ग पर ले जाती है। ये उपाय देंगे ढेरों लाभ- गुरूवार के दिन एक पानी वाला नारियल, एक जोड़ी जनेऊ और सवा पाव पीले रंग की मिठाई खरीद कर उसे सवा मीटर चमकीले पीले रंग के कपड़े में लपेट दें। अब इसे भगवान श्री हरि विष्णु के मंदिर में रख आएं। ध्यान रखें पीछे मुड़कर न देखें।
बुधवार को नारियल खरीद कर रात को सोते वक्त उसे अपने सिरहाने के पास रखें। बृहस्पतिवार की सुबह शुद्ध होकर स्वच्छ वस्त्र पहनकर श्री गणेश मंदिर में इस नारियल को चढ़ा दें।

टैंशन फ्री करेगा ये दान: सूखा नारियल लें उसे बीच में से खोखला करें उसमें 5 प्रकार के मेवे, 5 रूपए का सिक्का और चीनी का बुरादा डाल दें। ऊपर से नारियल को ढक दे। फिर पीपल के पेड़ पास जाएं हाथ जितना गड्डा खोदकर उसमें नारियल दबा दें। 


बृहस्पतिवार को पहनें पुखराज: नग राशि, दशा, समस्या व लगन के अनुसार कमजोर ग्रहों को बलवान करने के उद्देश्य से पहने जाते हैं। यदि गुरु नीच राशि का है और विवाह में विलंब है तो पुखराज पहनने की सलाह दी जाती है। पुखराज को बृहस्पतिवार के दिन सोने की अंगूठी में जड़वाएं। पुखराज का वजन कम से कम 3 रत्ती का होना चाहिए। विधिपूर्वक उपासना एवं पूजन के पश्चात निम्र 19000 मंत्र का जाप करके किसी शुक्ल पक्ष के बृहस्पतिवार को सूर्यास्त से एक घंटे पूर्व श्रद्धापूर्वक पुखराज की अंगूठी को तर्जनी उंगली में धारण करना चाहिए : ॐ बृं बृहस्पतये नम:। 

विदुर नीति: 4 कारण उड़ा देते हैं नींद

विदुर एक दासी के पुत्र थे, लेकिन उन्होंने अपनी नीतियों के बल पर इतिहास में श्रेष्ठ स्थान हासिल किया है। महामंत्री विदुर ने विदुर नीति नामक एक ग्रंथ की रचना भी की है। इस ग्रंथ में दी गई नीतियां आज भी हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। विदुर को यमराज का अवतार माना जाता है। आज हम जिस नीति के बारे में बताने जा रहें है उसमें विदुर जी ने 4 एेसी चार बातों का जिक्र किया है जिस से स्त्री हो या पुरुष दोनों की नींद उड़ जाती है।एक समय की बात है कि महाराज धृतराष्ट्र बहुत व्याकुल थे औऱ उन्हें नींद नहीं आ रही थी तो उन्होंने महामंत्री विदुर को अपने कक्ष में बुलवाया। विदुर जी के आने पर महाराज ने बताते हुए कहा कि मैं बहुत व्याकुल हूं। जब से संजय पांडवों के यहां से लौटकर आया है, तब से मेरा मन बहुत अशांत है। संजय कल सभा में क्या कहेगा ये सोच-सोच कर मन व्यथित हो रहा है। यह सब सुनने के बाद विदुर ने महाराज से एक महत्वपूर्ण नीति की बात कही। विदुर जी ने कहा कि चाहे स्त्री हो या पुरुष, जब इनके जीवन में ये चार बातें होती हैं। तब उनका मन अशांत हो जाता है और नींद उड़ जाती है।

विदुर ने महाराज धृतराष्ट्र से कहा यदि किसी व्यक्ति के मन में कामभाव जाग जाए तो उसे नींद नहीं आती। जब तक कामी व्यक्ति की काम भावना तृप्त नहीं हो जाती है, तब तक वह सो नहीं पाता। कामभावना व्यक्ति के मन को अशांत करती है और कामी व्यक्ति किसी भी कार्य को ठीक से नहीं कर पाता। यह भावना स्त्री और पुरुष दोनों की नींद उड़ा देती है।

जब किसी स्त्री या पुरुष की शत्रुता बहुत बलवान व्यक्ति से होती है तो उसकी नींद उड़ जाती है। निर्बल और साधनहीन व्यक्ति हर पल बलवान शत्रु से बचने के उपाय सोचता रहता है। उसे हमेशा यह भय सताता है कि कहीं बलवान शत्रु की वजह से कोई अनहोनी न हो जाए।

जब किसी व्यक्ति का सब कुछ छिन जाए तो उसकी रातों की नींद उड़ जाती है। ऐसा इंसान न तो चैन से जी पाता है और न ही सो पाता है। इस परिस्थिति में व्यक्ति हर पल छिनी हुई वस्तुओं को पुन: प्राप्त करने की योजनाओं में लगा रहता है। जब तक वह अपनी वस्तुएं पुन: पा नहीं लेता, तब तक उसे नींद नहीं आती है।

यदि किसी व्यक्ति की प्रवृत्ति चोरी की है, जो चोरी करके ही अपने उदर की पूर्ति करता है, जिसे चोरी करने की आदत हो, जो दूसरों का धन चुराने की योजनाएं बनाता रहता हो, उसे नींद नहीं आती। चोर हमेशा रात में चोरी करता है और दिन में इस बात से डरता है कि कहीं उसकी चोरी पकड़ी ना जाए। इस

माघ गुप्त नवरात्र का प्रारंभ: ये है शुभ मुहूर्त, पूजन विधि और उपाय

बुधवार दि॰ 17.01.18 को प्रातः 07:47 मि॰ के बाद मूल प्रकृति जगदंबा की उपासना का पर्व माघ गुप्त नवरात्र का प्रारंभ हो जाएगा। माघ शुक्ल प्रतिपदा किंस्तुगकरण हर्षण व वज्र योग के बनने से बुध ग्रह की शांति व बुद्धिबल में वृद्धि हेतु महादुर्गा की उपासना, पूजा व उपाय श्रेष्ठ रहेगा। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार बुध, सौरमंडल के नवग्रहों में सबसे छोटा व सूर्य से निकटतम ग्रह है। बुध ग्रह व्यक्ति को विद्वता, वाद-विवाद की क्षमता प्रदान करता है। यह जातक के दांतों, गर्दन, कंधे व त्वचा पर अपना प्रभाव डालता है। यह कम्युनिकेशन, नेटवर्किंग, विचार चर्चा व अभिव्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। कांस्य धातु प्रिय, उत्तर दिशा के स्वामी हरे रंग के बुद्धदेव का मूल अंक 5 है। देवी महादुर्गा बुद्धदेव पर अपना अधिपत्य रखती हैं। महादुर्गा व्यक्ति के 32 दांतों पर अपनी सत्ता रखती है। महादुर्गा तैंतीस कोटी देवताओं के तेज से प्रकट हुई थी। सभी देवताओं ने उन्हें अपने प्रिय अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित किया था। महादुर्गा मूलतः शिव अर्ध दंगा पार्वती का ही एक रूप है जिसके पूरक स्वयं दुर्गेश रूप में शिव हैं। माघ शुक्ल पक्ष में महादुर्गा के विशेष पूजन व उपाय से शत्रुओं पर जीत मिलती है, बुद्धिमत्ता में वृद्धि होती है व रोगों का शमन है।


पूजन विधि: संध्या काल में घर के ईशान कोण में हरा वस्त्र बिछाकर, महादुर्गा के चित्र की स्थापना कर विधिवत पूजन करें। कांसे के दिए गौघृत का दीप करें, सुगंधित धूप करें, गोलोचन से तिलक करें, मिश्री अर्पित करें व तिल मिश्रित मूंग की खिचड़ी का भोग लगाएं। किसी माला से 108 बार यह विशेष मंत्र जपें। पूजन उपरांत भोग प्रसाद स्वरूप वितरित करें। 

मकर संक्रांति: कई पीढ़ियों से चली आ रही दरिद्रता का करें नाश

हिन्दू काल गणना के अनुसार माघ महीने के शुरू में यानी जनवरी महीने के मध्य में सूर्य क्रमश: उत्तर दिशा की ओर उदय होने लगता है जो उत्तरायण कहलाता है। यह समय शुभ व मंगलकारी माना जाता है, इसीलिए इस दिन को भारतीय रीति-रिवाजों के अनुसार ‘मकर संक्रांति’ पर्व के रूप में मनाया जाता है। भारी ठंड के बावजूद लोग इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करते हैं व सूर्य को अर्घ्य देते हैं। इस मौके पर तिल-गुड़ के लड्डू व खिचड़ी दान देने तथा खाने का रिवाज है।


मकर-संक्रांति से जुड़ी मान्यताएं: एक प्राचीन कथा के अनुसार प्राचीन काल में नर्मदा नदी किनारे सुव्रत नामक ब्राह्मण रहता था जो योग शास्त्र, ज्योतिष और तंत्र विद्या का ज्ञानी था। इतना सब कुछ होने के बावजूद वह अपनी विधाओं का प्रयोग धर्म व मानवता के प्रचार की बजाय धन कमाने के लिए करने लगा। जब वह बूढ़ा हुआ तो उसे ध्यान में आया कि मेरे मरने के बाद मेरे धन का क्या होगा? मैंने अपने परलोक को सुधारने के लिए कुछ भी नहीं किया, मेरा उद्धार कैसे होगा?


एक दिन चोरों ने उसका सारा धन चोरी कर लिया लेकिन सुव्रत जरा भी परेशान नहीं हुआ क्योंकि इस वक्त वह केवल अपने उद्धार के बारे में सोच रहा था। अचानक उसे शास्त्रों में लिखा याद आया कि यदि माघ माह में वह शीतल जल में डुबकी लगाता है तो पापमुक्त होने के साथ-साथ वह स्वर्गलोक को भी जाएगा। वह तुरंत नर्मदा में स्नान करने निकल पड़ा। वह नौ दिनों तक श्रद्धापूर्वक नर्मदा के जल में स्नान करता रहा व दसवें दिन मृत्यु को प्राप्त हो स्वर्गलोक को गया।


एक अन्य मान्यता के अनुसार इच्छा मृत्यु प्राप्त भीष्म पितामह ने 56 दिनों तक शरशैय्या पर पड़े रहना ही उचित समझा क्योंकि तब दक्षिणायन था और वह प्राण उत्तरायण में त्यागना चाहते थे। माघ माह की शुक्ल अष्टमी यानी सूर्य के उत्तरायण होने पर ही उन्होंने प्राण त्यागे थे।


मकर-संक्रांति पर्व की शुरूआत गुरु गोरखनाथ जी के द्वारा की गई बताई जाती है व गोरखनाथ मंदिर में इस दिन खिचड़ी मेला लगता है। कुछ भी कहें, मकर संक्रांति का पूरा दिन पुण्यकाल के रूप में मनाया जाता है। इस दिन खिचड़ी, दाल, वस्त्र दान, गुड़-तिल दान देने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। शास्त्रों के अनुसार सूर्य उपासना से कई पीढिय़ों से चली आ रही दरिद्रता का नाश होता है। सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्रजा का जन्म होता है यानी सूर्यदेव हमारे लिए अन्नदाता हैं जिनकी किरणें भोजन बनाने में सहायक हैं। मकर संक्रांति पर्व भगवान सूर्यदेव की पूजा व स्नान- दान का पर्व है जिससे सुख-समृद्धि, धन-धान्य व अच्छे स्वास्थ्य की प्राप्ति होती है। 

मकर संक्रांति के अलग-अलग नामों के साथ जानें भारत में कैसे मनाते हैं ये पर्व

पंजाब और हरियाणा में मकर संक्रांति के एक दिन पहले हंसी-खुशी और उल्लास का त्यौहार ‘लोहड़ी’ मनाया जाता है। इस दिन शाम के समय लोग आग जलाकर उसके चारों तरफ नाचते हैं व तिल-गुड़ गच्चक, रेवडिय़ां, मूंगफली और मक्की के भुने दाने आपस में मिल बैठकर खाते हैं। परिवार में आने वाले नवजन्मे शिशु चाहे वह बेटा हो या बेटी, उसकी खुशी में पहली लोहड़ी धूमधाम से मनाई जाती है। उससे अगले दिन मकर संक्रांति को कई प्रकार के धार्मिक आयोजन होते हैं। पूरा आकाश रंग-बिरंगी पतंगों से भर जाता है व पतंगबाजी के मुकाबले देखने योग्य होते हैं।


असम में यह दिन ‘माघ बिहू’ के रूप में फसल की कटाई का उत्सव  माना जाता है। बिहू से एक दिन पूर्व ‘उरूका पर्व’ आयोजित किया जाता है जिसमें रात को ‘भेला घर’ यानी अलाव जलाकर भोज का आयोजन किया जाता है।


दक्षिण भारत में दूध व चावल की खीर तैयार कर ‘पोंगल’ मनाया जाता है। आंध्र प्रदेश में इस अवसर पर तीन दिन तक मंगल उत्सव मनाने की परंपरा है। प्रथम दिन ‘भोगी मंगल’ नामक पारिवारिक उत्सव मनाया जाता है। सूर्यदेव के नाम उत्सर्गित इस दिन चावल, दूध व गुड़ से लोग मंगल तैयार करते हैं। तीसरे दिन ‘मट्ट मंगल’ दिवस पर गायों, भैंसों व बैलों की पूजा की जाती है। उनके सींगों को साफ करके फिर रंगीन बनाया जाता है व गले में फूलों की माला डाल कर उनके प्रति कृतज्ञ भाव व्यक्त किया जाता है। गुजरात व सौराष्ट्र में ‘उत्तरायण’ के नाम से जाने जाने वाले इस दिन पर महिलाओं द्वारा हल्दी-कुमकुम लगाने का रिवाज है।


महाराष्ट्र में इस दिन लोग एक-दूसरे को तिल-गुड़ भेंट में देते हुए कहते हैं, ‘गुड़ तिल लीजिए और मीठा-मीठा बोलिए।’


उत्तर भारत में यह पर्व ‘खिचड़ी पर्व’ के रूप में प्रसिद्ध है। इस दिन लोग सामूहिक रूप से पवित्र नदियों में स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य देते हैं।

वास्तु की इन बातों को अपनाएं वर्किंग वुमन, मिलेगी सफलता

आज-कल के दौर में ज्यादातर महिलाएं वर्किंग वुमन है, जो घर के कामों के साथ ही प्रोफैशनली भी काम करती है। लेकिन कई महिलाओं की उन्नति आसाना से नहीं हो पाती। बहुत मेहनत करने के बाद कई बार उन्हें मनचाही सफलता नहीं मिल पाती। ऐसे में वास्तु शास्त्र आपकी मदद कर सकता है। आज हम आपको वास्तु की 8 ऐसी टिप्स देंगे जिन्हें खास तौर पर वर्किंग महिलाओं को फॉलो करना चाहिए। ऐसा करने से उन्हें करियर में मनचाही सफलता मिल सकती है। 


अक्सर महिलाओं को पैरों को क्रास करके बैठे पाया जाता है, लेकिन वास्तु की नजर में यह गलत होता है। इससे तरक्की में रूकाटव आती है। इस लिए महिलाओं को एेसे नहीं बैठना चाहिेए।


करियर में जल्दी और अच्छी ग्रोथ के लिए हमेशा ये ध्यान रखें कि ऑफिस में या किसी भी जगह काम करते समय चेयर हमेशा पीठ से ऊंची हो। इसे कारोबार की प्रगति के लिए अच्छा माना जाता है। 


घर या ऑफिस में आपकी वर्किंग टेबल चौकोर होना चाहिए, काम करने के दौरान गोल टेबल का प्रयोग बिल्कुल न करें।


अगर आपका ऑफिस घर में ही है या आप घर से काम करती हं तो भूलकर भी बैडरूम या उससे लगे हुए कमरे को वर्किंग रूम न बनाएं।


ऑफिस और घर की वर्किंग टेबल पर छोटे-छोटे क्रिस्टल रखें। ये आपको करियर में कई नए अवसर दिलाएंगे।


वर्किंग टेबल पर कम्प्यूटर, टैलिफोन जैसे इलेस्ट्रानिक वस्तुओं को हमेशा दक्षिण-पूर्वी कोने में रखें।


उत्तर-पूर्व दिशा को करियर की दिशा माना जाता है, इसलिए घर या ऑफिस की उत्तर-पूर्व दिशा में फूलों या पानी की तस्वीर लगाए।

Lohri: कहानी के साथ जानें क्यों मनाया जाता है ये त्यौहार

लोहड़ी की रात महिलाएं व अन्य पारिवारिक सदस्य एक-दूसरे को निशाना बना कर पंजाबी बोलियां गाते हुए हंसी-ठिठोली भी करते हैं। पंजाब में आमतौर घरों में गन्ने के रस व चावल के रस में दूध मिलाकर स्वादिष्ट खीर तैयार करने की भी परंपरा है।  आजकल तो लोगों द्वारा होटलों में लोहड़ी व पार्टी मनाने का प्रचलन भी शुरू हो चुका है। कुछ भी हो लोहड़ी पर बहाने से ही सही, सब लोग एक साथ इकट्ठे होकर खूब मस्ती करते हैं व एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते हुए खाते-पीते हैं। लोहड़ी एक अवसर है- सबको एक-दूसरे के करीब लाने और भाईचारा बनाए रखने का।


ऐतिहासिक कहानी 
बादशाह अकबर के शासन काल में सुंदरी एवं मुंदरी नाम की दो अनाथ लड़कियां थीं जिनको उनका चाचा विधिवत शादी न कर के एक राजा को भेंट कर देना चाहता था। उसी समय दुल्ला भट्टी नाम का एक नेक दिल डाकू था। उसने दोनों लड़कियों सुंदरी एवं मुंदरी को उनके चाचा से छुड़ा कर उनकी शादियां कीं। इस मुसीबत की घड़ी में दुल्ला भट्टी ने लड़कियों की मदद की और लड़के वालों को मना कर एक जंगल में आग जला कर दोनों लड़कियों का विवाह करवाया। दुल्ले ने खुद ही उन दोनों का कन्यादान किया।जल्दी-जल्दी में शादी की धूमधाम का इंतजाम भी न हो सका इसलिए दुल्ले ने उन लड़कियों की झोली में एक सेर शक्कर डाल कर ही उनको विदा किया। डाकू होकर भी दुल्ला भट्टी ने निर्धन लड़कियों के लिए पिता की भूमिका निभाई।