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देवउठनी एकादशी 2017: जानिए किस दिन है देवउठनी एकादशी, क्या है इसका महत्व

आषाढ़ माह की एकादशी को देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है और कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। एक साल में 24 एकादशी होती हैं। एक महीने में दो एकादशी आती हैं। सभी एकादशी में कार्तिक माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी महत्वपूर्ण मानी जाती हैं। इस एकादशी को देवउठनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। इस एकादशी को देवोत्थान एकादशी, देवउठनी ग्यारस, प्रबोधिनी एकादशी आदि नामों से भी जाना जाता है। इस दिन के धार्मिक मान्यता है कि इस दिन श्री हरि राजा बलि के राज्य से चातुर्मास का विश्राम पूरा करके बैकुंठ लौटे थे। इसके साथ इस दिन तुलसी विवाह भी किया जाता है।

देव उठनी एकादशी जिसे प्रबोधनी एकादशी भी कहा जाता है। इसे पापमुक्त करने वाली एकादशी भी माना जाता है। वैसे तो सभी एकादशी पापमुक्त करने वाली मानी जाती हैं, लेकिन इसका महत्व अधिक है। इसके लिए मान्यता है कि जितना पुण्य राजसूय यज्ञ करने से होता है उससे अधिक देवउठनी एकादशी के दिन होता है। इस दिन से चार माह पूर्व देवशयनी एकादशी मनाई जाती है। इसके लिए माना जाता है कि भगवान विष्णु समेत सभी देवता क्षीर सागर में जाकर सो जाते हैं। इसलिए इन दिनों पूजा-पाठ और दान-पुण्य के कार्य किए जाते हैं। किसी तरह का शुभ कार्य जैसे शादी, मुंडन, नामकरण संस्कार आदि नहीं किए जाते हैं।

शुभ कार्य इस दिन से किए जाने शुरु कर दिए जाते हैं। इस दिन माता तुलसी का विवाह किया जाता है। इसके बाद से शादी जैसे कार्य शुरु कर दिए जाते हैं। इस वर्ष ये शुभ दिन 31 अक्टूबर 2017 यानि मंगलवार को है। इस दिन दिवाली की तरह लोग दीपक जलाते हैं और सभी देवी-देवताओं को प्रसन्न करते हैं। जिससे उनके घर में हमेशा कृपा बनी रहे और उनके घर इसी तरह दीए की रौशनी से रौनक रहें।

ओडिशा का एक मंदिर, जहां नहीं होती किसी भगवान की पूजा

ओडिशा की राजधानी भुवनेश्वर में प्रसिद्ध राजारानी मंदिर काफी लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। यहां हजारों की संख्या में लोग हर साल घूमने के लिए आते हैं। 11वीं शताब्दी में बने इस मंदिर को स्थानीय लोग 'लव टैंपल' के रूप में जानते हैं। इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां किसी भगवान की पूजा नहीं की जाती है क्योंकि मंदिर के गर्भ-गृह में कोई प्रतिमा नहीं है।

यह मंदिर प्रचीन समय की उत्कृष्ट वास्तुशिल्प का बेहतरीन उदाहरण है, जहां दीवारों पर स्त्री और पुरुषों की कुछ कामोत्तेजक मूर्तियों की सुंदर नक्काशी की गई है। इसके अलावा मंदिर में शेर, हाथी, बैल की मूर्तियां हैं। ये कलाकृतियां मध्य प्रदेश के खजुराहो मंदिर की कलाकृतियों की याद दिलाती हैं।

मंदिर के निर्माण के लिए लाल और पीले रंग के बलुआ पत्थर के इस्तेमाल किया गया है। इन्हें स्थानीय भाषा में राजारानी कहा जाता है, इसलिए इस मंदिर का नाम राजारानी टैंपल पड़ा। इस मंदिर की देख-रेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण करता है और यहां जाने के लिए टिकट लेना पड़ता है।

हालांकि, मंदिर की दीवारों पर भगवान शिव और देवी पार्वती के चित्र बने होने के कारण शैव धर्म के साथ इसकी मजबूत संबंध लगता है। यह भी माना जाता है कि पूर्व में यह इंद्रेश्वर के रूप में जाना जाता था, भगवान शिव का एक रूप है। विभिन्न इतिहासकारों ने यह पाया है कि 11 वीं और 12 वीं शताब्दी के बीच बना है, यानी लगभग उसी समय में जब पुरी के जगन्नाथ मंदिर बना था।

मंदिर में महिलाओं के लुभावने जटिल और विस्तृत नक्काशी वाली मूर्तियां बनाई गई हैं। जैसे एक बच्चे को प्रेम करती महिला, दर्पण देखती महिला, पायल निकालती हुई महिला, म्यूजिक इंस्ट्रूमेंट बजाती और नाचती हुई महिलाओं की मूर्तियां यहां बनी हैं। इसके अलावा नटराज की मूर्ति, शिव के विवाह की मूर्ति भी यहां बनी हुई है।

राजारानी मंदिर का निर्माण पंचराठ शैली में किया गया है। हर साल 18 से 20 जनवरी तक ओडिशा सरकार का पर्यटन विभाग मंदिर में राजारानी संगीत समारोह का आयोजन करती है। देश के विभिन्न हिस्सों के संगीत कलाकार तीन दिवसीय महोत्सव में शामिल होते हैं, जिसमें शास्त्रीय संगीत का आयोजन होता है।

मां लक्ष्मी के ये 108 नामों का जाप आपके सारे दुखों को दूर कर सकते है

मां को आरती के साथ ही चालीसा का पाठ भी बहुत प्रिय है। इसके लिए मां के पूजन के बाद कमलगट्टे की माला से मां के 108 नामों का जान करना आपके सारे दुखों को दूर कर सकता है।

शास्‍त्रों के अनुसार अगर शुक्रवार दिन मां लक्ष्मी की पूजा को पूरे विधि-विधान से किया जाए तो मनुष्‍य को सौभाग्‍य की प्राप्ति होती है । मां लक्ष्मी के पूजन का शुभ दिन शुक्रवार को माना गया है और इस मां की पूजा में कई मंत्रों का जाप होता है। मां को आरती के साथ ही चालीसा का पाठ भी बहुत प्रिय है। इसके लिए मां के पूजन के बाद कमलगट्टे की माला से मां के 108 नामों का जान करना आपके सारे दुखों को दूर कर सकता है।

1. प्रकृति- प्रकृति 2. विकृति- दोरूपी प्रकृति 3. विद्या- बुद्धिमत्ता 4. सर्वभूतहितप्रदा- ऐसा व्यक्ति, जो संसार के सारे सुख दे सके 5. श्रद्धा- जिसकी पूजा होती है 6. विभूति- धन की देवी 7. सुरभि स्वर्गीय- देवी, 8. परमात्मिका- सर्वव्यापी देवी 9. वाची- जिसके पास अमृत भाषण की तरह हो 10. पद्मालया- जो कमल पर रहती है 11. पद्मा- कमल 12. शुचि- पवित्रता की देवी 13. स्वाहा- शुभ 14. स्वधा- ऐसी अव्यक्ति जो अशुभता को दूर करे 15. सुधा- अमृत की देवी, धन्या- आभार का अवतार, हिरण्मयीं- जिसकी दिखावट गोल्डन है 18. लक्ष्मी- धन और समृद्धि की देवी 19. नित्यपुष्ट- जिससे दिन पर दिन शक्ति मिलती है 20. विभा- जिसका चेहरा दीप्तिमान है 21. अदिति- जिसकी चमक सूरज की तरह है 22. दीत्य- जो प्रार्थना का जवाब देता है 23. दीप्ता- लौ की तरह 24. वसुधा- पृथ्वी की देवी 25. वसुधारिणी- पृथ्वी की रक्षक 27. कांता- भगवान विष्णु की पत्नी 28. कामाक्षी- आकर्षक आंख वाली देवी 29. कमलसंभवा- जो कमल में से उपस्थित होती है 30. अनुग्रहप्रदा- जो शुभकामनाओं का आशीर्वाद देती है,

31. बुद्धि- बुद्धि की देवी 32. अनघा- निष्पाप या शुद्ध की देवी 33. हरिवल्लभी- भगवान विष्णु की पत्नी 34. अशोक- दु:ख को दूर करने वाली 35. अमृता- अमृत की देवी 36. दीपा- दितिमान दिखने वाली 37. लोक शोक विनाशिनी- सांसारिक मुसीबतों को निगलने वाली, 38. धर्मनिलया- अनंत कानून स्थापित करने वाली 39. करुणा- अनुकंपा देवी 40. लोकमट्री- ब्रह्माण्ड की देवी 41. पद्मप्रिया- कमल की प्रेमी 42. पद्महस्ता- जिसके हाथ कमल की तरह हैं 43. पद्माक्ष्य- जिसकी आंख कमल के जैसी है 44. पद्मसुंदरी- कमल की तरह सुंदर 45. पद्मोद्भवा- कमल से उपस्थित होने वाली 46. पद्ममुखी- कमल के दीप्तिमान जैसी देवी 47. पद्मनाभप्रिया- पद्मनाभ की प्रेमिका- भगवान विष्णु 48. रमा- भगवान विष्णु को खुश करने वाले 49. पद्ममालाधरा- कमल की माला पहनने वाली 50. देवी- देवी, 51. पद्मिनी- कमल की तरह 52. पद्मगंधिनी- कमल की तरह खुशबू है जिसकी 53. पुण्यगंधा- दिव्य सुगंधित देवी 54. सुप्रसन्ना- अनुकंपा देवी 55. प्रसादाभिमुखी- वरदान और इच्छाओं का अनुदान देने वाली 56. प्रभा- देवी जिसका दीप्तिमान सूरज की तरह हो 57. चन्द्र वंदना- जिसका दीप्तिमान चन्द्र की तरह हो, 58. चंदा- चन्द्र की तरह शांत 59. चन्द्र सहोदरी- चन्द्रमा की बहन 60. चतुर्भुजा- चार सशस्त्र देवी 61, चन्द्ररूपा- चन्द्रमा की तरह सुंदर 62. इंदिरा- सूर्य की तरह चमक 63. इंदुशीतला- चांद की तरह शुद्ध 64. अह्लाद जननी- खुशी देने वाली 65. पुष्टि- स्वास्थ्य की देवी, 

66. शिव- शुभ देवी 67. शिवाकारी- शुभ का अवतार 68. सत्या- सच्चाई 69. विमला- शुद्ध 70. विश्वजननी- ब्रह्माण्ड की देवी 71. पुष्टि- धन का स्वामी, 72. दरिद्रियनशिनी- गरीबी को निकालने वाली 73. प्रीता पुष्करिणी- देवी जिसकी आंखें सुखदायक है 74. शांता- शांतिपूर्ण देवी 75. शुक्लमालबारा- सफेद वस्त्र पहनने वाली 77. बिल्वनिलया- जो बिल्व पेड़ के नीचे रहता है 78. वरारोहा- देवी, जो इच्छाओं का दान देने वाली है 79. यशस्विनी- प्रसिद्धि और भाग्य की देवी, 80. वसुंधरा- धरती माता की बेटी 81. उदरंगा- जिसका शरीर सुंदर है 82. हरिनी- हिरण की तरह है जो 83. हेमा मालिनी- जिसके पास स्वर्ण हार है 84. धनधान्यकी- स्वास्थ्य प्रदान करने वाली 85. सिद्धि- रक्षक 86. स्टरीनासौम्य- महिलाओं पर अच्छाई बरसाने वाली 87. शुभप्रभा- जो शुभता प्रदान करे, 88. नृपवेशवगाथानंदा- महलों में रहता है जो 89. वरलक्ष्मी- समृद्धि की दाता 90. वसुप्रदा- धन को प्रदान करने वाली 91. शुभा- शुभ देवी 92. हिरण्यप्राका- सोने में 93. समुद्रतनया- महासागर की बेटी 94. जया- विजय की देवी 95. मंगला- सबसे शुभ, 96. देवी- देवता या देवी97. विष्णुवक्षः- जिसके सीने में भगवान विष्णु रहते हैं 98. विष्णुपत्नी- भगवान विष्णु की पत्नी 99. प्रसन्नाक्षी- जीवंत आंख वाले 100. नारायण समाश्रिता- जो भगवान नारायण के चरण में जाना चाहता है 101. दरिद्रिया ध्वंसिनी- गरीबी समाप्त करने वाली 102. डेवलष्मी- देवी, 103. सर्वपद्रवनिवर्णिनी- दु:ख दूर करने वाली 104. नवदुर्गा- दुर्गा के सभी नौ रूप 105. महाकाली- काली देवी का एक रूप 106. ब्रह्मा-विष्णु-शिवात्मिका- ब्रह्मा-विष्णु-शिव के रूप में देवी 107. त्रिकालज्ञानसंपन्ना- जिससे अतीत, वर्तमान और भविष्य के बारे में पता है 108. भुवनेश्वराय- ब्रह्माण्ड की देवी या देवता।

इस बार की छोटी दीपावली यानी देउठनी एकादशी है पाप नाशक

देवउठनी एकादशी या देवप्रबोधिनी एकादशी का बहुत धार्मिक महत्व है। दीपावली के ग्यारहवें दिन इसे मनाया जाता है। कई जगहों पर इसे छोटी दीपावली भी कहा जाता है। इस दिन तुलसी-विवाह का आयोजन भी किया जाता है।

माना जाता है कि आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी जिसे देवशयनी एकादशी कहा जाता है, उस दिन विष्णु सहित सारे देवता क्षीरसागर में विश्राम करने चले जाते हैं। अत: इन चार माह में किसी भी तरह के शुभ कार्यों का आयोजन नहीं किया जाता है। देव प्रबोधिनी एकादशी पर देवों का विश्राम पूरा होता है शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को देव प्रबोधिनी एकादशी का त्योहार मनाया जाता है।

माना जाता है कि इस दिन सूर्य और दूसरे सभी ग्रह अपनी स्थिति में परिवर्तन करते हैं, जिसका प्रबाव मनुष्य की इंद्रियों पर पड़ता है। इससे बचने के लिए व्रत, ध्यान और आराधना की जाती है। इसी कड़ी में देव प्रबोधिनी एकादशी इसलिए भी महत्वपूर्ण हो उठती है कि इस दिन चार माह पश्चात देव उठते हैं।

महत्व

देव उठनी या देव प्रबोधिनी एकादशी का बहुत पौराणिक महत्व है।

  • इसे पाप विनाशिनी और मुक्ति देने वाली एकादशी कहा जाता है, पुराणों में लिखा है कि इस दिन के आने से पहले तक गंगा दान का महत्व होता है, इस दिन उपवास रखने का पुण्य कई तीर्थ दर्शन, हजार अश्वमेध यज्ञ और सौ राजसूय यज्ञ के तुल्य माना गया है।
  • इस दिन का महत्व स्वयं ब्रह्मा ने नारद को बताते हुए कहा था कि इस दिन एक समय खाना खाने से एक जन्म, रात को भोजन करने से दो जन्म और पूरा दिन व्रत रखने से कई जन्मों के पापों का नाश होता है।
  • इस दिन व्रत करने से कई जन्मों का उद्धार होता है और बड़ी-से-बड़ी मनोकामना पूरी होती हैं।
  • माना जाता है कि इस एकादशी पर व्रत करने का पुण्य राजसूय यज्ञ करने से कहीं ज्यादा है। वेदों में कहा गया है कि इस एकादशी का व्रत करने से पुण्य की प्राप्ति होती है जो कई तीर्थ दर्शन, अश्वमेघ यज्ञ, सौ राजसूय यज्ञ के तुल्य माना गया है।

व्रत विधि

देवउठनी एकादशी को व्रत के दिन सूर्योदय से पूर्व नित्य कार्य करके व्रत का संकल्प लें और सूर्य भगवान को अर्घ्य दें। पुराणों में कहा गया है कि यदि आप दान नदी के तट या कुएं पर करें तो बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन निराहार उपवास किया जाता है। दूसरे दिन द्वादशी को पूजा करके व्रत का उद्यापन कर भोजन किया जाना चाहिए। इस दिन बैल पत्र, शमी पत्र और तुलसी चढ़ाने का और तुलसी विवाह का बहुत महत्व है। तुलसी विवाह से संबंधित कथा भी इस व्रत के साथ जुड़ती है।

धार्मिक कारणों से इत्तर व्यावहारिक रूप से बारिश के चार माह में कृषि संबंधी गतिविधियों और दूसरी व्यावहारिक मुश्किलों के चलते कोई शुभ और मंगल कार्य किए जाने संभव नहीं होते हैं, इसलिए भी इन चार महीनों में इन्हें वर्जित किया गया है। याद रहें कि पारंपरिक रूप से भारत की अर्थव्यवस्था कृषि-प्रधान है बारिश के महीनों में खेतों में काम ज्यादा हुआ करता है। दूसरा शादी-ब्याह या दूसरे मांगलिक आयोजनों में बारिश की वजह से व्यवस्था में मुश्किल होती है, इसलिए भी बारिश के चार महीनों में मांगलिक कार्य वर्जित बताए गए हैं।

तुलसी जी के 8 नाम, जो पूर्ण करते हैं पूजन और देते हैं पुण्य

शास्त्रों में कहा है देवताओं के दिन-रात धरती के छह महीने के बराबर होते हैं। इसी आधार पर जब वर्षाकाल प्रारंभ होता है, तो देवशयनी एकादशी को देवताओं की रात्रि प्रारंभ होकर शुक्ल एकादशी यानी देवउठनी एकादशी तक छह माह तक देवताओं की रात रहती है। कहा जाता है कि इस दौरान तुलसी की पूजा से ही देवपूजा का फल मिलता है।

देवउठनी से छह महीने तक देवताओं का दिन प्रारंभ हो जाता है। अतः तुलसी का भगवान श्री हरि विष्णु की शालीग्राम स्वरूप के साथ प्रतीकात्मक विवाह कर श्रद्धालु उन्हें वैकुंठ को विदा करते हैं। इस तिथि को तुलसी बैकुंठ लोक में चली जाती हैं और देवताओं की जागृति होकर उनकी समस्त शक्तियों पृथ्वी लोक में आकर लोक कल्याणकारी बन जाती हैं।

तुलसी पूजा का मंत्र

वृन्दा वृन्दावनी विश्वपूजिता विश्वपावनी। पुष्पसारा नन्दनीच तुलसी कृष्ण जीवनी।।

एतभामांष्टक चैव स्रोतं नामर्थं संयुक्तम। य: पठेत तां च सम्पूज् सौऽश्रमेघ फललंमेता।।

तुलसी के आठ नाम – वृंदा, वृंदावनी, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नन्दिनी, तुलसी और कृष्ण जीवनी। इस मंत्र का जाप करें या नहीं हो सके, तो तुलसी के इन आठ नामों को स्मरण करने से ही अक्षय फल मिलते हैं।

इन चीजों से करें तुलसी पूजन

तुलसी पूजा के लिए घी का दीपक और धूप लगाएं। सिंदूर, चंदन, नैवद्य और पुष्प अर्पित करें। रोजाना तुलसी का पूजन करने से घर का वातावरण पवित्र रहता है। इस पौधे में कर्इ ऐसे तत्व भी होते हैं, जिनसे रोग प्रतिरोधक क्षमता मिलती है। इसे प्राणदायनी कहा जाता है और जल या दूध में तुलसीदल डालने से वह पंचामृत हो जाता है।

तुलसी लगाते हुए रखें इन बातों का विशेष ध्यान, इसके बाद कभी नहीं सूखता पौधा

कार्तिक माह में तुलसी का पूजन बहुत महत्वपूर्ण होता है। अगर आपके घर में तुलसी का पौधा नहीं है या कुछ खराब हो गया है तो इस माह में तुलसी का पौधा लगाना बहुत शुभ माना जाता है। भगवान श्री हरि ने तुलसी के ह्रदय में शालिग्राम रुप में निवास करते हैं, इसी कारण से तुलसी बहुत ही फलदायी होती है। तुलसी का पूजन हमेशा करना तो फलदायी होता ही है लेकिन कार्तिक माह में पूजा करने से फल कई गुना तक बढ़ जाता है। ऐसी मान्यता है कि तुलसी पर भगवान विष्णु की विशेष कृपा है और साथ ही सभी देवी-देवताओं की तुलसी प्रिय होती है। घर में तुलसी का पौधा का पौधा होना सिर्फ धार्मिक रुप से ही महत्वपूर्ण नहीं होता है बल्कि स्वास्थय के लिए भी लाभदायक होता है।

तुलसी का पौधा आज के दिन लगाना शुभ माना जाता है अगर आपके घर का पौधा सूख गया है तो इस विधि से तुलसी विवाह के दिन नया पौधा लगाएंगे तो वो कभी नहीं सूखेगा। तुलसी का पौधा ना ही अधिक ठंड में लगाना चाहिए और ना ही अधिक गर्मी के मौसम में, नंवबर का माह सबसे उचित माह माना जाता है। किसी से अगर तुलसी का पौधा लाए तो वो बिल्कुल नया होना चाहिए क्योंकि पुराने पौधे के जड़े विकसित कर जाती हैं। तुलसी का पौधा लगाने के लिए हमेशा मिट्टी का ही गमला लेना चाहिए। पौधा लगाने के लिए काली मिट्टी सबसे उचित मानी जाती है, अगर ये उपलब्ध ना हो तो सामान्य मिट्टी लें, लेकिन पीली मिट्टी बिल्कुल नहीं लेनी चाहिए।

तुलसी का पौधा रोपण करते समय मिट्टी को अच्छे से दबा दें और उसे ऊपर तक भर दें, इससे पौधा गिरेगा नहीं। इसके बाद बीच में गहरा छेद बनाएं और उसमें पौधे को लगा दें। पौधे की जड़ों को मिट्टी से ढ़क दें। इसके बाद गमले में पानी भर दें। पौधे को रोजाना पानी दें और उसे 3 महीनों तक छाएं में रखें। इसके बाद जहां हल्की धूप आती हो, वहीं इस पौधे को रखें।

इस गुफा को बताया जाता है भीम का निवास स्थान

भारत हमेशा से अपनी संस्कृति और रहस्यों को लेकर चर्चित रहने वाला देश है। इसी तरह हम आज भारत की एक रहस्यमयी गुफा के बारे में बताने जा रहे हैं जिसका संबंध महाभारत के काल से रहा है। भारत के मध्यप्रदेश प्रांत के रायसेन जिले में ये गुफाएं स्थित हैं। गुफा के चारो तरफ विंध्य पर्वतमालाएं हैं, इनका संबंध नव-पाषाण काल से है। मध्य भारत के पाठार के दक्षिणी किनारे स्थित विध्याचल की पहाड़ियों के निचले छोर पर स्थित भीमबेटका गुफाएं महाभारत काल में निर्मित हुई थी, इस प्रकार की मान्यता है। इन गुफाओं के दक्षिण से सतपुड़ा की पहाड़ियां शुरु हो जाती हैं। भीमबेटका गुफाओं में बनी चित्रकारियां यहां रहने वाले पाषाणकालीन मनुष्यों के जीवन को दर्शाती हैं।

इन गुफाओं को भीम का निवास स्थान भी माना जाता है। हिंदू ग्रंथ महाभारत के अनुसार भीम पांच पांडवों में से द्वितीय थे। भीम के निवास स्थान के कारण ही इनका नाम भीमबैठका पड़ा। भीमबेटका गुफ़ाओं में प्राकृतिक लाल और सफ़ेद रंगों से वन्यप्राणियों के शिकार दृश्यों के अलावा घोड़े, हाथी, बाघ आदि के चित्र उकेरे गए हैं। इन चित्र में से यह दर्शाए गए चित्र मुख्‍यत है; नृत्‍य, संगीत बजाने, शिकार करने, घोड़ों और हाथियों की सवारी, शरीर पर आभूषणों को सजाने और शहद जमा करने के बारे में हैं। घरेलू दृश्‍यों में भी एक आकस्मिक विषय वस्‍तु बनती है।

टीक और साक के पेड़ों से घिरी भीमबेटका गुफाओं को यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत के रुप में मान्यता दी गई है। मध्य प्रदेश के भीमबेटका क्षेत्र को भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने राष्ट्रीय महत्व का स्थल घोषित किया गया है। इस गुफा को भारत के मानव जीवन का प्राचीनतम चिन्ह माना गया है। ये गुफा आदि-मानवों द्वारा बनाए गए शैलचित्रों और शैलाश्रयों के लिए प्रसिद्ध है।