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टकराव में फंसी दुनिया के लिये आतंकवाद भी मुनाफे का बाजार


भारत ने पहली बार पाकिस्तानी पोस्ट को फायर एसाल्ट से उडाने की विडियो जारी कर खुद को अमेरिका और इजरायल की कतार में खड़ा कर दिया । क्योंकि सामान्य तौर पर भारत या पाकिस्तान ही नहीं बल्कि चीन और रुस भी अपनी सेना का कार्रवाई का वीडियो जारी तो नहीं ही करते हैं। तो इसका मतलब है क्या । क्या अब पाकिसातन अपने देश में राष्ट्रवाद जगाने के लिए कोई वीडियो जारी कर देगा । या फिर समूची दुनिया ही जिस टकराव के दौर में जा फंसी है, उसी में भारत भी एक बडा खिलाड़ी खुद को मान रहा है । क्योंकि दुनिया के सच को समझे तो गृह युद्द सरीखे अशांत क्षेत्र के फेहरिस्त में सीरिया ,यमन , अफगानिस्तान ,सोमालिया , लिबिया , इराक , सूडान और दक्षिण सूडान हैं । तो आतंक की गिरप्त में आये देशों की फेरहिस्त में पाकिस्तान , बांग्लादेश , म्यानमार ,टर्की और नाइजेरिया है।

तो आंतकी हमले की आहट के खौफ तले भारत , फ्रास ,बेल्जियम ,जर्मनी ,ब्रिटेन और स्वीडन हैं । वहीं देशों के टकराव का आलम ये हो चला है कि अलग अलग मुद्दों पर उत्तर कोरिया , दक्षिण कोरिया ,चीन ,रुस ,फिलीपिंस , जापान, मलेशिया ,इंडोनेशिया ,कुर्द और रुस तक अपनी ताकत दिखाने से नहीं चूक रहे। तो क्या दुनिया का सच यही है दुनिया टकराव के दौर में है । या फिर टकराव के पीछे का सच कुछ ऐसा है कि हर कोई आंख मूंदे हुये है क्योकि दुनिया का असल सच तो ये है कि 11 खरब , 29 अरब 62 करोड रुपये का धंधा या हथियार बाजार । जी दुनिया में सबसे बडा धंधा अगर कुछ है तो वह है हथियारों का । और जब दुनिया का नक्शा ही अगर लाल रंग से रंगा है तो मान लीजिये अब बहुत कम जमीन बची है जहा आतंकवाद, गृह युद्द या दोनों देशों का टकराव ना हो रहा हो । और ये तस्वीर ही बताती है कि कमोवेश हर देश को ताकत बरकरार रखने के लिये हथियार चाहिये । तो एक तरफ हथियारों की सलाना खरीद फरोख्त का आंकडा पिछले बरस तक करीब 11 सौ 30 खरब रुपये हो चुका है।

तो दूसरी तरफ युद्द ना हो इसके लिये बने यूनाइटेड नेशन के पांच वीटो वाले देश अमेरिका, रुस , चीन , फ्रासं और ब्रिटेन ही सबसे ज्यादा हथियारो के बेचते है । आंकडो से समझे तो स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्त इस्टीटयूट के मुताबिक अमेरिका सबसे ज्यादा 47169 मिलियन डालर तो रुस 33169 मिलियन डालर , चीन 8768 मिलियन डालर , फ्रास 8561 मिलियन डालर और ब्रिट्रेन 6586 मिलियन डालर का हथियार बेचता है । यानी दुनिया में शांति स्तापित करने के लिये बने यूनाइटेड नेशन के पांचो वीटो देश के हथियारो के धंधे को अगर जोड दिया जाये तो एक लाख 4 हजार 270 मिलियन डालर होता है । यानी चौथे नंबर पर आने वाले जर्मनी को छोड़ दिया जाये तो हथियारों को बेचने के लिये पांचो वीटो देशो का दरवाजा ही सबसे बडा खुला हुआ है । आज की तारीख में अमेरिका-रुस और चीन जैसे देशों की नजर में हर वो देश है,जो हथियार खऱीद सकता है। क्योंकि हथियार निर्यात बाजार का सबसे बड़ा हिस्सा इन्हीं तीन देशों के पास है । अमेरिका के पास 33 फीसदी बाजार है तो रुस के पास 23 फीसदी और चीन के पास करीब 7 फीसदी हिस्सा है ।यानी अमेरिकी राष्ट्रपति जो दो दिन पहले ही रियाद पहुंचे और दनिया में बहस होने लगी कि इस्लामिक देसो के साथ अमेरिकी रुख नरम क्यो है तो उसके पीछे का सच यही है कि अमेरिका ने साउदी अरब के साथ 110 बिलियन डालर का सौदा किया । यानी सवाल ये नहीं है कि अमेरिका इरान को बुराई देशों की फेहरिस्त में रख कर विरोध कर रहा है । सवाल है कि क्या आने वाले वक्त में ईरान के खिलाफ अमेरिकी सेन्य कार्रवाई दिखायी देगी । और जिस तरह दुनिया मैनेचेस्टर पर हमला करने वाले आईएस पर भी बंटा हुआ है उसमें सिवाय हथियारो को बेच मुनापा बनाये रखने के और कौन सी थ्योरी हो सकती है ।

और विकसित देसो के हथियारो के धंधे का असर भारत जैसे विकासशील देसो पर कैसे पडता है ये भारत के हथियारों की खरीद से समझा जा सकता है । फिलहाल , भारत दुनिया का सबसे बडा या कहे पहले नंबर का देश का जो हथियार खरीदता है । आलम ये है कि 2012 से 2016 के बीच पूरी दुनिया में हुए भारी हथियारों के आयात का अकेले 13 फ़ीसदी भारत ने आयात किया. । स्कॉटहोम इंटरनेशनल पीस रीसर्च इंस्टीट्यूट की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत ने 2007-2016 के दौरान भारत के हथियार आयात में 43 फ़ीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई । और जिस देश में जय जवान-जय किसान का नारा आज भी लोकप्रिय है-उसका सच यह है कि 2002-03 में हमारा रक्षा बजट 65,000 करोड़ रुपये का था जो 2016-17 तक बढ़कर 2.58 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है. । जबकि 2005-06 में कृषि को बजट में 6,361 करोड़ रुपये मिले थे जो 2016-17 में ब्याज सब्सिडी घटाने के बाद 20,984 करोड़ रुपये बनते हैं । यानी रक्षा क्षेत्र में 100 फीसदी विदेशी निवेश की इजाजत के बावजूद भारत के लिए विदेशों से हथियार खरीदना मजबूरी है। जिसका असर खेती ही नहीं हर दूसरे क्षे6 पर पड रहा है । और जानकारों का कहना है कि भारत हथियार उद्योग में अगले 10 साल में 250 अरब डॉलर का निवेश करने वाला है । यानी ये सवाल छोटा है कि मैनचेस्टर में इस्लामिक स्टेट का आंतकी हमला हो गया । या भारत ने पाकिसातनी सेना की पोस्ट को आंतक को पनाह देने वाला बताया । या फिर सीरिया में आईएस को लेकर अमेरिका और रुस ही आमने सामने है । सवाल है कि टकराव के दौर में फंसी दुनिया के लिये आंतकवाद भी मुनाफे का बाजार है ।

गामा पहलवान : दुनिया का सबसे महान पहलवान जिसे लोग हिंदू-मुस्लिम भाईचारे के लिए भी याद रखेंगे!

70 या 80 के दशक तक पैदा हुए बच्चों पर अनजाने ही समाजवाद का असर रहता था. हर बहस में कुछ सवाल घूम-घूम कर आते. मसलन अगर हिंदुस्तान और पाकिस्तान में लडाई हो जाए तो कौन-कौन से देश हमारा साथ देंगे. सबसे पहले नाम आता था यूएसएसआर यानी सोवियत संघ का. यह संघ तो अब टूट चुका है. एक और सवाल भी बहस का सबब बनता था कि अगर दारा सिंह और मोहम्मद अली में लड़ाई हो जाए तो कौन जीतेगा? ‘भाई साहब दारा सिंह ने एक बार उसको पकड़ लिया न बस, खेल ख़त्म.’ जवाब मिल चुका होता था.

ऐसा ही एक सवाल होता था, ‘किंग कॉन्ग और गामा में लड़ाई हो जाए तो कौन जीतेगा?’ सभी का जवाब एक ही होता था – गामा पहलवान. तब बहुत कम बच्चों को यह मालूम था कि किंग कॉन्ग सिर्फ एक फंतासी है. उधर न फोटो देखी होती थी, न यह मालूम था कि गामा ने किस-किसको हराया है. बस सुनी-सुनाई बातें और कोरी कल्पना के सहारे गामा का नाम हमारे ज़हन पर हावी था. एक बात और, तब किसी को यह भी नहीं मालूम था कि गामा हिंदू हैं या मुसलमान. दरअसल, तब यह सवाल था ही नहीं.

आज के दिन सन 1878 में अमृतसर में पैदा हुए गामा पहलवान का असल नाम था- ग़ुलाम मोहम्मद. वालिद भी देसी कुश्ती के खिलाड़ी थे. चुनांचे शुरूआती तालीम घर पर ही हुई. 10 साल की उम्र में उन्होंने पहली कुश्ती लड़ी थी. पहली बार उन्हें चर्चा मिली उस दंगल से जो जोधपुर के राजा ने 1890 में करवाया था. छोटे उस्ताद गामा ने भी उस दंगल में हाज़िरी दे डाली थी. जोधपुर के राजा ने जब गामा की चपलता और कसरत देखी तो दंग रह गए. उन्हें कुछ एक पहलवानों से लड़ाया भी गया. गामा पहले 15 पहलवानों में आये. राजा ने गामा को विजेता घोषित किया.

कहते हैं यहां से गामा ने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा. 19 के होते-होते गामा ने हिंदुस्तान के एक से एक नामचीन पहलवान को हरा दिया था. पर एक नाम था जो देश में कुश्ती के मैदान में बड़ी इज्ज़त के साथ लिया जाता था- गुजरांवाला के करीम बक्श सुल्तानी. यह नाम अब भी गामा के लिए एक चुनौती था.

लाहौर में दोनों के बीच कुश्ती का दंगल रखा गया, और कहते हैं कि तमाम लाहौर उस दिन सिर्फ दंगल देखने उस मैदान में टूट पड़ा था. तकरीबन सात फुट ऊंचे करीम बक्श के सामने पांच फुट सात इंच के गामा बिलकुल बच्चे लग रहे थे. जैसा कि अमूमन होता है कि नए घोड़े पर दांव नहीं लगाया जाता. सबने यही सोचा था कि थोड़ी देर में सुल्तानी गामा को चित्त कर देंगे. तीन घंटे तक लोग चिल्लाते रहे, भाव बढ़ते- घटते रहे. अंत में नतीजा कुछ नहीं निकला. दोनों बराबरी पर छूटे. इस दंगल का असर यह हुआ कि गामा हिंदुस्तान भर में मशहूर हो गए.

विश्व विजेता पहलवान गामा से कुश्ती लड़ने आया ही नहीं

1910 में अपने भाई के साथ गामा लंदन के लिए रवाना हो गए थे. लंदन में उन दिनों ‘चैंपियंस ऑफ़ चैंपियंस’ नाम की कुश्ती प्रतियोगिता हो रही थी. इसके नियमों के हिसाब से गामा का कद कम था लिहाज़ा उन्हें दंगल में शरीक होने से रोक दिया गया. गामा इस बात पर गुस्सा हो गए और ऐलान कर दिया कि वे दुनिया के किसी भी पहलवान को हरा सकते हैं और अगर ऐसा नहीं हुआ वे जीतने वाले पहलवान को इनाम देकर हिंदुस्तान लौट जायेंगे.

उन दिनों विश्व कुश्ती में पोलैंड के स्तानिस्लौस ज्बयिशको, फ्रांस के फ्रैंक गाच और अमरीका के बेंजामिन रोलर काफी मशहूर थे. रोलर ने गामा की चुनौती स्वीकार कर ली. पहले राउंड में गामा ने उन्हें डेढ़ मिनट में चित कर दिया और दुसरे राउंड में 10 मिनट से भी कम समय में उन्हें फिर पटखनी दे डाली! फिर अगले दिन गामा ने दुनिया भर से आये 12 पहलवानों को मिनटों में हराकर तहलका मचा दिया. आयोजकों को हारकर गामा को दंगल में एंट्री देनी पड़ी.

फिर आया सितम्बर 10, 1910 का वह दिन जब जॉन बुल प्रतियोगिता में गामा के सामने विश्व विजेता पोलैंड के स्तानिस्लौस ज्बयिशको थे. एक मिनट में गामा ने उन्हें गिरा दिया और फिर अगले ढाई घंटे तक वे फ़र्श से चिपका रहे ताकि चित न हो जाएं. मैच बराबरी पर छूटा. चूंकि विजेता का फ़ैसला नहीं हो पाया था, इसलिए हफ़्ते भर बाद दोबारा कुश्ती रखी गयी. 17 सितम्बर, 1910 के दिन स्तानिस्लौस ज्बयिशको लड़ने ही नहीं आए. गामा को विजेता मान लिया गया. पत्रकारों ने जब ज्बयिशको से पुछा तो उनका कहना था, ‘ये आदमी मेरे बूते का नहीं है.’ जब गामा से पूछा गया तो उन्होंने कहा, ‘मुझे लड़कर हारने में ज़्यादा ख़ुशी मिलती बजाय बिना लड़े जीतकर!’

हिंदू परिवारों का रखवाला

1947 में हालात ख़राब थे. गामा अमृतसर से लाहौर की मोहिनी गली में बस गए थे. बंटवारे ने हिंदू-मुसलमान के बीच बड़ी दीवार खड़ी कर दी थी. गली में रहने वाले हिंदुओं की जान सांसत में थी. ‘रुस्तम-ए-हिंद’ और ‘रुस्तम-ए-ज़मां’ तब आगे आए. किस्सा है कि उन्होंने कहा, ‘इस गली के हिंदू मेरे भाई हैं. देखें इनपर कौन सा मुसलमान आंख या हाथ उठाता है!’

आग हर तरफ फैली हुई थी. लिहाज़ा, कुछ फ़िरकापरस्त उस गली के मुहाने पर आ खड़े हुए जहां गामा अपने चेलों के साथ हिंदुओं की रखवाली कर रहे थे. जैसे ही एक फ़िरकापरस्त आगे बढ़ा गामा ने उसे वह चपत लगाई कि बाकियों की घिग्गी बंध गयी. उस गली के एक भी हिंदू को खरोंच तक नहीं आई. जब हालात बहुत बिगड़ गए तो गामा ने अपने पैसों से गली के हिंदुओं को पाकिस्तान से रवाना किया.

बुढ़ापे और गर्दिश के दिन

गामा ता-जिंदगी हारे नहीं. उन्हें दुनिया में कुश्ती का सबसे महान खिलाड़ी कहा जाता है. पर बात वही है न. बुढ़ापा ऐसे महान खिलाड़ियों का भी ग़रीबी में ही कटता है, सो उनका भी कटा. हिंदुस्तान के घनश्याम दास बिड़ला कुश्ती प्रेमी थे. उन्होंने दो हज़ार की एक मुश्त राशि और 300 रूपये मासिक पेंशन गामा के लिए बांध दी थी. बड़ौदा के राजा भी उनकी मदद के लिए आगे आये थे. पाकिस्तान में जब इस बात पर हो-हल्ला हुआ तब सरकार ने गामा के इलाज़ के लिए पैसे दिए. इससे याद आया कि बड़ौदा के संग्रहालय में 1200 किलो का एक पत्थर रखा हुआ है जिसे 23 दिसम्बर, 1902 के दिन गामा उठाकर कुछ दूर तक चले थे!

चलते-चलते

हाल ही में पहलवानी और कुश्ती से जुडी दो फिल्में- ‘सुलतान’ और ‘दंगल’ काफी हिट रही हैं. अभिनेताओं और निर्माताओं ने करोड़ों कमाये हैं. कमाना भी चाहिए. पर क्या सलमान खान और आमिर खान में से कोई राष्ट्रीय खेल संस्थान, पटियाला जाकर इस खेल को आगे बढ़ाने के लिए कुछ धनराशि देकर आया होगा? आपको जानकर ख़ुशी होगी कि इस खेल संस्थान में गामा द्वारा कसरत के लिए इस्तेमाल में लाये गए उपकरण मौजूद हैं. एक बात और, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की बेग़म कुलसूम नवाज़ हमारे उस्ताद गामा पहलवान की पोती हैं!

तुम इतने कट्टर क्यों हो भक्तो!

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं…

अमेरिका और भारत दुनिया में लोकतंत्र के मानक कहे जाते हैं। प्रधानमत्रंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रम्प के पूर्ववर्तियों, मनमोहन सिंह और बराक ओबामा को सारी दुनिया सार्वजनिक जीवन में शिष्टता का प्रतीक मानती रही है। इस सन्दर्भ में मोदी का पिछले वर्ष का अमेरिकी दौरा याद कीजिये। सैन फ्रांसिस्को में फेसबुक मुख्यालय पर भारतीयों से मुलाकात के दौरान स्वयं होस्ट मार्क जुकरबर्ग को मोदी ने कैमरे की जद से धक्का मारकर किनारे कर दिया था।

ऐसी ही सड़कछाप उजड्डता ट्रम्प ने भी हालिया पहले विदेशी दौरे में सहयोगी नाटो राष्ट्राध्यक्षों के जमावड़े में दिखायी, जब वे मोंटेनीग्रो के प्रधानमंत्री को धकियाते हुए कैमरे के केंद्र में पहुँच गए। क्या दोनों भक्त समूहों के लिए यह विचलन की घड़ी हो सकती थी? नहीं, जरा भी नहीं। उनके लिए तो यह उनके नायकों की सहज चेष्टा ही रही।

उत्तर पश्चिमी अमेरिका के बारिश भरे प्रान्त ऑरेगोन की सबवे ट्रेन में नस्ली गुरूर में डूबे एक व्हाइट अमेरिकी ने हिजाब पहनी हुयी दो अमेरिकी मुस्लिम औरतों को अनाप-शनाप दुत्कारना शुरू कर दिया। टोकने पर उसने एक के बाद एक तीन व्हाइट सहयात्रियों को चाकू मार दिया, जिनमें दो की मृत्यु हो गयी।

उत्तर पश्चिमी भारत के पशु बहुल राजस्थान प्रान्त में मुस्लिम गाय व्यापारियों के एक समूह पर स्वयंभू गौ-रक्षक को सरेआम लाठियों से ताबड़तोड़ हमला कर हत्या करने में रत्ती भर भी संकोच नहीं हुआ। अमेरिका का राष्ट्रपति संभावित आतंकवाद रोकने के नाम पर अपने ही देश के मुस्लिम नागरिकों को देश में प्रवेश पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा देता है। भारत का सेनाध्यक्ष पत्थर फेंकते कश्मीरी मुस्लिम युवकों को देश के ‘दुश्मन’ की संज्ञा से संबोधित करता है। ट्रम्प और मोदी समर्थकों के लिए यह सब राष्ट्रीय शर्म का नहीं, अपने नायकों के प्रति प्रतिबद्धता दिखाने का अवसर सरीखा है।

कौन हैं ये भक्त और क्या वे रातोंरात कट्टर भक्ति लिये पैदा हो गए? अमेरिका के नस्ली गोरे और भारत के सवर्ण दावेदार! वे जो इतिहास को नकारना चाहते हैं और क्रमशः ट्रम्प और मोदी में अपने मुक्तिदाता को देखते हैं। इसे विसंगति मत समझिये कि अमेरिकी गृहयुद्ध के नायक और दास प्रथा को समाप्त करने वाले अब्राहम लिंकन नहीं, कॉर्पोरेट एनपीए में अमेरिका को डुबाने वाले रोनाल्ड रीगन हैं ट्रम्प के आदर्श।।

नस्ली गोरों का एजेंडा रहा है काले और लातीनी समुदाय को अमेरिका से खदेड़ना, जो उनके हिसाब से अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ हैं। उन्हें भावी अप्रवासियों को भी अमेरिका में आने से रोकना है जो उनके ख्याल से उनका रोजगार खा रहे हैं। आखिर ट्रम्प की राजनीति भी इसी तरह अमेरिका को महान बनाने की ही तो है।

भक्तों के लिए उस मोदी में भी कोई विसंगति नहीं है जो गाँधी को तो राष्ट्रपिता कहता है पर गाँधी के घोषित उत्तराधिकारी और आधुनिक भारत के निर्माता नेहरू को कोसने और गाँधी के वैचारिक हत्यारे सावरकर को महिमामंडित करने में पूरी ऊर्जा लगा देता है। सोचिये, स्वतंत्र भारत में सवर्ण सपने क्या रहे हैं? मुसलमानों और ईसाइयों का दमन, पाकिस्तान की पिटाई, दलित शोषण, आरक्षण की समाप्ति, कम्युनिस्ट दमन, मर्द अधीन स्त्री, मनुवाद और परलोकवाद की स्थापना! उसके हिसाब से भारत की सनातनी श्रेष्ठता के लिए आवश्यक तत्व यही हैं। क्या मोदी शासन उसके सपनों को ही हवा नहीं देता!

समीकरण सीधा है, लोकतंत्र में हर विचारधारा को अपना राजनीतिक प्रतिनिधि चाहिए। नस्ली और सवर्ण श्रेष्ठता के पैरोकारों को भी। अन्यथा,अमेरिका में नस्ली-धार्मिक और भारत में सांप्रदायिक-जातीय घृणा के जब-तब फूटने वाले हालिया उभार में नया कुछ नहीं है, सिवाय इसके कि आज इन दोनों लोकतांत्रिक देशों के शासन पर जो काबिज हैं, ट्रम्प और मोदी, उन्होंने अपनी विजय यात्रा इसी घृणा की लहर पर सवार होकर तय की है।

यानी स्वाभाविक है, जनसंख्या के एक प्रबल हिस्से का घोषित एजेंडा और शासन में बने रहने का ट्रम्प-मोदी का अघोषित एजेंडा परस्पर गड्मड् होकर दोनों देशों की धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय धरोहर को बेशक आशंकित करते रहें, भक्तों को तो आश्वस्त ही रखेंगे। स्पष्टतः न मोदी भक्ति 2014 और न ट्रम्प भक्ति 2016 अचानक या जल्दबाजी में संपन्न हुयी परिघटना हैं|

मोदी और ट्रम्प भक्तों में अद्भुत समानता है। मोदी और ट्रम्प कितना भी फिसलें, उनके भक्तों की कट्टर निष्ठा अडिग रहेगी। बेशक ट्रम्प से चिपके तमाम लैंगिक और नस्ली कलंक उदाहरणों में अब राष्ट्रपति चुनाव अभियान में रूस से मिलीभगत के गंभीर आरोप भी शामिल हो गए हों। बेशक,मोदी के सांप्रदायिक और कॉर्पोरेट-यारी वाले चेहरे को इतिहास के सबसे बड़े फेकू होने का दर्जा मिल रहा हो।

ये सब बातें भक्तों के लिए बेमानी हैं। मजबूत तर्क और अकाट्य तथ्य उनकी भक्ति को हिला नहीं सकते। दरअसल, मोदी और ट्रम्प अपने इन कट्टर समर्थकों के क्रमशः सोलह आना खरे राजनीतिक प्रतिनिधि सिद्ध हुए हैं। इस हद तक और इतने इंतजार के बाद कि उनके लिए वे एकमात्र विकल्प जैसे हैं।

दोनों के भक्तों के अडिग आचरण को समझने के लिए यहाँ एक और पर्दाफाश जरूरी है। अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवारी अभियान में माना जाता था कि ट्रम्प ने बड़े आक्रामक अंदाज में रिपब्लिकन पार्टी का नामांकन हथियाया है। लेकिन अब पार्टी का केंद्र और उसका समर्थक मीडिया,ओबामा केयर समाप्त करने और अमीरों को टैक्स छूट देने में ही नहीं, चिर-दुश्मन रूससे मिलीभगत की छानबीन में भी जिस अंदाज में ट्रम्प के साथ खड़े नजर आते हैं, उनके एक दूसरे का पूरक होने में कोई शक नहीं।

मोदी ने संघ के आशीर्वाद से भाजपा का नेतृत्व हथियाया था। तब भी,उनके कैंप की ओर से,खरीदी मीडिया के माध्यम से, लगातार‘विकास’ के एजेंडे पर इस तरह जोर दिखाया जाता रहा है मानो संघ की हिंदुत्व ध्रुवीकरण की विभाजक पैंतरेबाजियों से मोदी का लेना-देना न हो। जाहिर है,संघ के दलित और मुस्लिम विरोधी एजेंडे पर ही नहीं, किसान और मजदूर की कीमत पर व्यापारियों और पूंजीशाहों के बेशर्म पोषण पर भी, संघ और मोदी की प्रशासनिक एकता इस छद्म प्रचार को अब और अधिक चलने नहीं दे पा रही।

इस आलोक में ट्रम्प और मोदी की चुनावी सफलतायें उतनी आकस्मिक नहीं रह जाती हैं, जितना उनके विरोधी विश्वास करना चाहेंगे। न ही उनके अंधसमर्थकों को ऐसे बरगलाये लोगों का समूह मानना सही होगा, जिन्हें राष्ट्रीय विरासत, लोकतांत्रिक परम्पराओं और संवैधानिक दबावों के रास्ते पर लाने की बात जब-तब बौद्धिक आकलनों में उठाई जाती है।

दरअसल,समर्थकों की तिरस्कृत पड़ी आकांक्षाओं को मोदी और ट्रम्प ने राष्ट्रीय राजनीति में जैसे प्रतिष्ठित किया है, वे चिर ऋणी क्यों न रहें? समझे, भला भक्त इतने कट्टर क्यों?

ट्रंप-मोदी का गले मिलना गले की फांस ना बन जाये !

अमेरिका में ट्रंप -मोदी का गले मिलना चीन से लेकर पाकिस्तान और ईरान तक के गले नहीं उतर रहा है । तो चीन सिक्किम और अरुणाचल में सक्रिय हो चला है। तो पाकिस्तान कश्मीर और अफगानिस्तान के लिये नई रणनीति बना रहा है और पहली बार अमेरिका के इस्लामिक टैररइज्म के जिक्र के बीच ईरान ने बहरीन, यमन के साथ साथ कश्मीर को लेकर इस्लामिक एकजुटता का जिक्र कहना शुरु कर दिया है। और इन नये हालातो के बीच चीन ने एक तरफ मानसरोवर यात्रा पर अपने दरवाजे से निकलता रास्ता बंद कर दिया है । तो दूसरी तरफ कल जम्मू से शुरु हो रही अमरनाथ यात्रा में अब तक सबसे कम रजिस्ट्रेशन हुआ है। जबकि परसों से भक्त बाबा बर्फानी के दर्शन कर सकेंगे। तो क्या आतंकवाद के खिलाफ भारत के साथ खडे हुये अमेरिका को लेकर साउथ-इस्ट एशिया नये तरीके से केन्द्र में आ गया है।

तो पहली बार अमेरिका ने आतंकवाद को इस्लाम से जोड़ा और भारत ने इस्लामिक आंतकवाद का शब्द इस्तेमाल ना कर आतंकवाद को कट्टरता से जोड़ा है। बावजूद इसके तीन हालातो पर अब गौर करने की जरुरत है। पहला, ट्रंप ने नार्थ कोरिया का नाम लिया लेकिन पाकिस्तान का नाम नहीं लिया। दूसरा, ईरान को इस्लामिक टैररइज्म से ट्रंप जोड़ चुके हैं। लेकिन भारत ईरान पर खामोश है। तीसरा,ईरान कश्मीर के आतंक को इस्लाम से जोड़ इस्लामिक देशों के सहयोग की बात कर रही है। तो सवाल कई हैं मसलन आतंक को इस्लामिक टैररइज्म माना जाये। आतंक को दहशतगर्दों का आतंक माना जाये। आतंक को पाकिसातन की स्टेट पॉलेसी माना जाये। और अगर तीनों हालात एकसरीखे ही हैं सिर्फ शब्दो के हेर फेर का खेल है तो नया सवाल अमेरिका के अंतराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची सैयद सलाउद्दीन के डालने का है। क्योंकि अमेरिकी सूची में लश्कर का हाफिज सईद है। आईएसएस का बगदादी है। हक्कानी गुट का सिराजुद्दीन हक्कानी है । अलकायदा का जवाहरी है।

लेकिन इन तमाम आतंकवादियो की हिंसक आतंकी कार्रवाई लगातार जारी है । और अमेरिकी आंतकी सूची पर यूनाइटेड नेशन ने भी कोई पहल नही की । और खास बात ये है कि अमेरिका के ग्लोबल आतंकवादियों की सूची में 274 नाम है । इसी बरस 25 आतंकवादियों को इस सूची में डाला गया है । यानी नया नाम सैययद सलाउद्दीन का है तो नया सवाल कश्मीर का है। क्योंकि 1989 में सलाउद्दीन घाटी के इसी आतंकी माहौल के बीच सीमापार गया था और तभी से पाकिस्तान ने अभी तक सैय्यद सलाउ्द्दीन को अपने आतंक के लिये सलाउद्दीन को ढाल बनाया हुआ था। लेकिन सवाल है कि क्या वाकई अमेरिकी ग्लौबल टैरर लिस्ट में सैयद सलाउद्दीन का नाम आने से हिजबुल के आंतक पर नकेल कस जायेगी। तो जरा आतंक को लेकर अमेरिकी की समझ को भी पहले समझ लें । दरअसल 16 बरस पहले अमेरिकी वर्लड ट्रेड टावर पर अलकायदा के हमले ने अमेरिका को पहली बार आतंकवादियों की लिस्ट बनाने के लिये मजबूर किया ।

और बीते 16 बरस में अलकायदा के 34 आतंकवादियों को अमेरिका ने ग्लोबल टैरर लिस्ट में रख दिया । लेकिन आतंक का विस्तार जिस तेजी से दुनिया में होता चला गया उसका सच ये भी रहा कि बीते सोलह बरस में एक लाख से ज्यादा लोग आतंकी हिंसा में मारे गये । और अमेरिकी टेरर लिस्ट में अलकायदा के बाद इस्लामिक स्टेट यानी आईएस के 33 आतंकवादियों के नाम शामिल हुये। लेबनान में सक्रिय हिजबुल्ला के 13 आतंकवादी तो हमास के सात आंतकवादियो को ग्लोबल टैटरर लिस्ट में अमेरिका ने डाल दिया । अमेरिकी लिस्ट में लश्कर और हक्कानी गुट के चार चार आतंकवादियों को भी डाला गया । यानी कुल 274 आंतकवादी अमेरिकी लिस्ट में शामिल है । और अब कल ही सैयद सलाउद्दीन का नाम भी अमेरिकी ग्लोबल टैरर लिस्ट में आ गया । तो याद कर लीजिये जब पहली बार सलाउद्दीन ने बंदूक ठायी थी । 1987 के चुनाव में कश्मीर के अमिरकदल विधानसभा सीट से सैयद सलाउद्दीन जो तब मोहम्मद युसुफ शाह के नाम से जाना जाता था। मुस्लिम यूनाइटेड फ्रांट के टिकट पर चुनाव लड़ा। हार गया। या कहें हरा दिया गया। तब युसुफ शाह का पोलिंग एंजेट यासिन मलिक था। जो अभी जेकेएलएफ का मुखिया है। और पिछले दिनो पीडीपी सांसद मुज्जफर बेग ने कश्मीर के हालात का बखान करते करते जब 1987 का जिक्र ये कहकर किया कि सलाउद्दीन हो या यासिन मलिक उनके हाथ में बंदूक हमने थमायी। यानी उस चुनावी व्यवस्था ने दिल्ली के इशारे पर हमेशा लूट लिया गया। तो समझना होगा कि अभी कश्मीर में सत्ता पीडीपी की ही है। और पहली बार कश्मीर की सत्ता में पीडीपी की साथी बीजेपी है जिसे घाटी में एक सीट पर भी जीत नहीं मिली।

इसी दौर में पहली बार किसी कश्मीरी आतंकवादी का नाम अमेरिका के अपनी ग्लोबल टैरर लिस्ट में डाला है। यानी उपरी तौर पर कह सकते हैं कि पाकिस्तान को पहली बार इस मायने में सीधा झटका लगा है कि कश्मीर की हिंसा को वह अभी तक फ्रीडम स्ट्रगल कहता रहा। कभी मुशर्रफ ने कहा तो पिछले दिनो नवाज शरीफ ने यूनाइटेड नेशन में कहा। और इसकी वजह यही रही कि भारत ने कश्मीरियों की हिसा को आतंकवाद से सीधे नहीं जोडा लेकिन अब जब सैयद सलाउद्दीन का नाम ग्लौबल टैरर लिस्ट में डाला जा चुका है तो अब कशमीरियो की हिसा भी आंतकवाद के कानूनी दायरे में ही आयेगी । लेकिन भारत के लिये आंतक से निपटने का रास्ता अमेरिकी सूची पर नहीं टिका है । क्योंकि सच तो ये भी है कि अमेरिकी ग्लोबल लिस्ट में जिस भी संगठन या जिस भी आतंकवादी का नाम है उसकी आंतकवादी घटनाओ में कोई कमी आई नहीं है । यानी सिर्फ ग्लोबल टैरर लिस्ट का कोई असर पड़ता नहीं । और तो और यूएन की लिस्ट में लश्कर के हाफिज सईद का नाम है । लेकिन हाफिज की आतंकी कार्रवाई थमी नहीं है । कश्मीर में आये दिन लश्कर की आंतकी सक्रियता आंतक के नये नये चेहरो के जरीये जारी है । यानी अमेरिकी पहल जब तक पाकिसातन को आंतकी देश घोषित नहीं करती तब तक पाकिस्तान पर कोई आर्थिक प्रतिबंध लग नहीं सकता । और प्रतिबंध ना लगने का मतलब अरबो रुपयो की मदद का सिलसिला जारी रहेगा । यानी अमेरिका अपनी सुविधा के लिये भारत के साथ खडा होकर उत्तर कोरिया का नाम लेकर चीन पर निशाना साध सकता है । लेकिन पाकिसातनी आंतकी संगठन जैश ए मोहम्मद के मुखिया अजहर मसूद को यूएन में चीन के क्लीन चीट पर भारत के साथ भी खडा नहीं होता। पाकिस्तान को आंतकी राज्य नहीं मानता क्योंकि अफगानिस्तान में उसे पाकिसातन की जरुरत है । तो फिर गले लगकर आतंक से कैसे लड़ा जा सकता है जब गले लगना गले की फांस बनती हो ।

डोकलाम संकट: भारत को बेखबरी से निकलने की ज़रूरत

थोथी बहादुरी का प्रदर्शन करने की अभ्यस्त फ़ौज की सेवा निवृत मूंछें अभी भी कह सकती हैं कि चीन जो कह रहा है, कोरी गीदड़ भभकी है। भारत की ताकत का उसे पूरा अनुमान है, इसीलिये वह ऐसा कोई कदम नहीं उठायेगा, जो दोनों देशों के बीच सीमित अथवा विस्तृत किसी भी प्रकार के युद्ध का कारण बन सकता है। और इसीलिये जब तक वैसा कोई अघटन नहीं घटता है, ये बैठे-ठाले फ़ौजी और शासक दल के मुखापेक्षी चैनल के ज़रख़रीद ऐंकर कहते रहेंगे – डोकलाम में हम अभी चालीस ही हैं तो क्या हुआ, चीन की समूची फ़ौज के लिये ये चालीस ही बहुत भारी हैं ; डटे रहो ! कोई तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकता।

किसी तरह की भूल बेहद खतरनाक

लेकिन हक़ीक़त में परिस्थिति इतनी आसान दिखाई नहीं देती है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा संचालित अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ की बातों को यदि हमारी तमतमाती हुई सेवानिवृत फ़ौजी मूंछों की तरह गीदड़ भभकी मानने की भूल न करें तो कल ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने बहुत ही साफ शब्दों में डोकलाम में चीन की आगे की सैनिक रणनीति का पूरा नक़्शा बता दिया है। इसमें दो हफ़्ते के अंदर ही एक सीमित सैनिक कार्रवाई के जरिये भारतीय सैनिकों को डोकलाम के विवादित क्षेत्र से हटा देने की बात कही गई है।

पिछले चौबीस घंटों में चीन के छ: मंत्रालयों और संस्थाओं द्वारा जारी किये गये बयानों के आधार पर ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने अपना यह अनुमान पेश किया है। आज के ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित ‘ग्लोबल टाइम्स’ की टिप्पणी के बारे में रिपोर्ट में संघात एकेडमी आफ सोशल साइंसेस के अन्तरराष्ट्रीय संबंधों के शोधार्थी हू झियोंग के एक लेख को उद्धृत किया गया है जिसमें वे लिखते हैं कि ,” चौबीस घंटों के अंदर चीन की ओर से की गई एक के बाद एक टिप्पणियों के जरिये भारत को यह साफ संकेत दे दिया गया है कि चीन ज्यादा समय तक अपनी सीमा में भारतीय सैनिकों के अनुप्रवेश को सहन नहीं करेगा।”

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संसद में।

कार्रवाई से पहले देगा सूचना

‘ग्लोबल टाइम्स’ को उन्होंने कहा कि अपनी कार्रवाई करने के पहले चीन भारत के विदेश मंत्रालय को सूचित कर देगा। हू के शब्दों में “भारत को इसके परिणाम भुगतने होंगे।”

भारत के विदेश मंत्रालय ने यद्यपि अब तक इस नये घटना-क्रम पर कोई बयान नहीं दिया है, लेकिन भारत सरकार या उसके अधिकारियों के रुख़ में एक अजीब सी लापरवाही का नजरिया दिखाई देता है। वे संकट की इस घड़ी में जैसे ‘राम राम’ कहते हुए एक ही बात को बुदबुदा रहे हैं कि “युद्ध किसी चीज का इलाज नहीं है। परिस्थिति को तनाव मुक्त करने के लिये वे कूटनीतिक रास्तों का प्रयोग कर रहे हैं।”

हम नहीं जानते कि भारतीय पक्ष के इन ‘प्रयत्नों’ में  कितनी सचाई है और कितनी कोरी ख़ुशफ़हमी। लेकिन चीन की ओर से प्रतिदिन कड़े हो रहे बयानों से तो इन ‘कूटनीतिक प्रयत्नों’ की वास्तविकता की कोई झलक नहीं मिलती है। इधर के एक भी बयान में चीन ने भारत के साथ कूटनीतिक चैनल पर चल रही किसी भी वार्ता का कोई संकेत नहीं दिया है। यद्यपि इंडियन एक्सप्रेस की इसी रिपोर्ट में एक भारतीय सूत्र के हवाले से यह बताया गया है कि हू झियोंग हमेशा से एक भारत-विरोधी व्यक्ति रहे हैं और वे चीन के सैनिक संस्थान के प्रवक्ता नहीं हैं। वे वहां की केंद्रीय सरकार के ‘थिंक टैंक’ के सदस्य भी नहीं है, सिर्फ प्रांतीय स्तर के बुद्धिजीवी हैं।

नक्शे में डोकलाम।

तैयारियों का आ चुका है ब्योरा

वैसे ‘ग्लोबल टाइम्स’ के 5 अगस्त के संपादकीय में भारत के खिलाफ चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की युद्ध की भरपूर तैयारियों का एक ब्यौरा दिया गया है जिसमें कहा गया है कि यह युद्ध निश्चित परिणामों को हासिल करने के लिए लड़ा जायेगा। “यह युद्ध यदि फैलता है तो पीएलए के पास इतनी शक्ति है कि वह सीमाई क्षेत्र से भारत की फ़ौज का सफ़ाया कर दे।”

चीन की ओर से लगातार आ रहे इन भड़काऊ बयानों पर भारत की चुप्पी के कूटनीतिक महत्व को मानते हुए भी हम फिर यही दोहरायेंगे कि किसी भी स्थिति में ऐसे मामलों में भ्रम में नहीं रहना चाहिए। किसी भी राष्ट्र की बेखबरी कभी भी उसके लिये बहुत भारी साबित हो सकती है।

क्या आतंकवाद खत्म करना आसान है?

आतंकवाद खत्म करना अवश्य सरल है लेकिन वह जो उसके आविष्कारक हैं वे इसे खत्म नहीं करना चाहते क्योंकि इसी में उनका लाभ है-दुनिया हैरान है कि यह कैसे मुसलमान हैं जो अपने आप को एक दूसरे के भाई कहते हैं, लेकिन आपस में इतना लड़ते झगड़ते हैं कि एक दूसरे की जान व माल का लिहाज़ नहीं करते और नरसंहार में व्यस्त रहते हैं।कुछ मुसलमान हज़रात जो विद्वान और अहले दानिश (बुद्धिजीवी) हैं वे भी इस बात से परेशान और दुखी हैं कि यह कैसा समय आ गया जहां विशेषतः इराक, सीरिया, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में एक मुस्लिम दुसरे मुस्लिमों की खून का प्यासा बन गया है। यह मुसलमान हजारों नहीं बल्की लाखों अपने ही भाईयों का नरसंहार कर रहा है। सब नमाज़ी, सब रोज़ेदार और सब हुलिया से दीनदार लेकिन एक बहुत बड़ा तबका इसी की आड़ में और इस्लाम के नाम पर एक दूसरे के खून का प्यासा है।आईएसआईएस के युवाओं को और तालिबान को देखें तो सब का हुलिया दीनदार, सभी की ज़ुबानों पर कलमा और तकबीर लेकिन सब खूनी भेड़िये। हर कोई समझ रहा है कि यह समय बहुत ही खराब और पुर फितन है।लेकिन जिन लोगों ने इस्लामी इतिहास का अध्ययन किया है वे जानते हैं कि यह ऐसा पहली बार और अंतिम बार नहीं हो रहा है।इस श्रृंखला की शुरुआत हमारे पैगंबर की मृत्यु के तीन साल बाद हुई,उसमान रादिअल्लाहु अन्हु के समय से शुरू हुई। खुद सहाबा ए किराम एक दुसरे के खिलाफ लामबंद हो गए और हजारों शहीद कर दिए गए।

हक़ पर कौन था और कौन हक़ पर नहीं यह अलग मामला है मरे और उजड़ें तो सही। सिफ्फीन की जंग क्या थी? सब कुरआन के हाफिज़ सब कुरआन के हर आदेशों को जानते थे,लेकिन बहुमत क्या करती थी? इखलास और लिल्लाहियत का क्या हुवा?हज़रत अली, जिन्होंने इस्लाम के संरक्षण के लिए हर बलिदान दिया उन के साथ हजरत मुआविया रादिअल्लाहु अन्हु ने क्या सुलूक किया केवल पुत्र मोह में उसे अपना उत्तराधिकारी बनाया और बैतूल माल का रुपया अयोग्य लोगों को अपना हमनवा बनाने के लिए इस्तेमाल किया।लोगों से अपने लिए और अपने बेटे यज़ीद के लिए शक्ति के बल पर बैत ली। इनकार करने वालों को सज़ाएँ दीं और हत्या तक करने की अनुमति दे दी। यह सब लोग कौन थे, मुत्तक़ी और परहेज़गार थे और ईमान वाले थे। मारने वाले भी कुरआन और हदीस में विशेषज्ञ और मरने वाले भी। बहुत से सहाबी जो युद्धक्षेत्र में रुस्तम और असफंद यार के कारनामों को तुच्छ साबित कर रहे थे। वे सब अपनी तलवार और तीर धनुष को तोड़ कर घरों में आ बैठे और सिपह सालारी के काम से अलग होकर अध्यापन के काम में व्यस्त हो गए। हज़रत साद बिन अबी वक़ास जो ईरान के विजेता थे और कुदसिया के युद्ध का मैदान जीत चुके थे वे आंतरिक मतभेद के समय गोशा नशीनी और गुमनामी का जीवन अपने लिए पसंद करके ऊंटों और बकरियों की देखभाल में व्यस्त हो गए थे।चालाकियों,रेशा दानियों और फरेब कारियों के कामों से कोई जमाना खाली नहीं है।

हज़रत अमीर मुआविया को उत्तराधिकारी बनाने का विचार खुद अपने लाभ के लिये मुगिरा बिन शोअबा ने दिया था और इस तरह मुसलमानों में एक ऐसी रस्म जारी करवा दी जिससे लोकतंत्र जाती रही और पिता के बाद बेटा राजा होने लगा। यह रस्म इस्लामी आदेश के खिलाफ थी लेकिन आज भी जारी है और आज भी विरोध करने वालों को कैद या मार दिया जाता है। हज़रत इमाम हुसैन की शहादत के बाद बीस साल तक मक्का, मदीना, इराक और सीरिया के मुसलमानों में जो युद्ध हुईं वह आज के आइएसआइएस और तालिबान की लड़ाई से कम नहीं थीं। जब उस समय के हालात का अध्ययन करते हैं तो कलेजा मुंह को आ जाता है और दिल निकल कर हथेलियों में आ जाता है। इराक और कूफ़ा वालों की रेशा दानियाँ उनकी गद्दारी,उबैदुल्लाह बिन ज़्याद की ज़्यादती और बेरहमी यह सब आज के आईएसआइएस और तालिबान से कम नहीं हैं। अब्दुल्ला बिन जुबैर ने अपने भाषण में कहा था कि “लोगो!दुनिया में इराक के लोगों से बुरे कहीं आदमी नहीं हैं और ईराकियों में सबसे बदतर कुफी लोग हैं”। मुस्लिम बन उक़बा ने यज़ीद के आदेश से 27 ज़िल्हिज्जा 63 हिजरी में मदीना पर हमला किया और प्रवेश कर तीन दिन तक नरसंहार और लूटपाट का सिलसिला जारी रखा। जिसने यजीद के नाम पर बैत की वह बच गया और जिसने इंकार कर दिया वह मारा गया।

29 मुहर्रम को हुसैन बिन नुमैर ने कोह अबू कुबैस पर गुलेल स्थापित करके काबा पर पत्थरबाज़ी शुरू की और पत्थरबाज़ी तीन महीने तक चली। इससे काबा के गिलाफ जल गए और दीवारों काली हो गई जिसमें हजारों मुसलमान मारे गए, मुख्तार बिन अबू उबैदा का लड़ाई का सिलसिला चला, युद्ध ख्वारिज चली, मुख्तार का नुबुवत का दावा और कुर्सी अली कि घटना घटी,अब्दुल्ला बिन जुबैर के भाई मुसाब बिन ज़ुबैर की अधिकार और न्याय के लिए युद्ध और कुफे वालों का उनके साथ धोखा देकर हत्या करवाना, अब्दुल मलिक बिन मरवान का धोखे के साथ अम्र बिन सईद की हत्या करवाना यह सब आज के तालिबान और आईएसआईएस के अत्याचार से कम नहीं था।

(कुछ मुस्लिम विद्वानों का यह दावा है कि हुजुर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफात के केवल तीन साल बाद आपकी शिक्षाओं का असर सहाबा पर ख़त्म नहीं हो सकता और ऐसी नरसंहार हो नहीं सकती। इस्लामी इतिहास तो साठ सत्तर साल बाद लिखी गई और लिखने वाले शिया और खारजी थे जिन्होंने जानबूझ कर इतिहास को विकृत कर दिया और मुनाफिक यहूदी अब्दुल्ला बिन सबाह ने तक़वा और परहेज़गारी का लबादा ओढ़ कर इस्लाम के नाम पर बदले की कार्यवाही की (अल्लाह आलम)। क्या आज का मुसलमान कभी यह सोच सकता है कि वे काबा पर पत्थरबाज़ी करेगा या बमबारी करेगा?बिल्कुल नहीं। लेकिन 72हिजरी में हज्जाज बिन यूसुफ ने माहे रमज़ान में मक्के की घेराबंदी करके संगबारी की और कोहे सफा के निकट अब्दुल्लाह बिन जुबैर को शहीद करके सर तन से अलग कर दिया और लाश वहीं लटका दी। क्या आज कोई मुसलमान ऐसा करने की सोच सकता है?” कुफा वालों ने हमेशा शीआने अली शीआने हुसैन होने का दावा करने के बावजूद हज़रत अली का साथ छोड़ दिया,हज़रत इमाम हुसैन को,हज़रत मुसअब बिन ज़ुबैर को ज़ैद बिन अली बिन अल हुसैन को धोखा दिया और उन्हें क़त्ल करवा दिया। हाल में सद्दाम हुसैन ने क्या किया लाखों लोगों को जहरीली गैस से मरवा दिया। हाल के, बश्शार अल असद के पिता ने पचास हज़ार मुसलमानों को मौत के घाट उतार दिया। खुद बश्शार अल असद ने पांच लाख मुसलमानों को मार डाला और तीस लाख लोग घायल हो गए और लाखों लोगों को देश छोड़ने के लिए मजबूर किया। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान,सउदी ने लाखों तुर्क और दूसरों को बम और गोलियों के साथ उड़ा दिया।

यहां उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि मुसलमान को मुसलमान के ही मारने का सिलसिला तब भी था और अब भी है। तब भी नाम अल्लाह का और इस्लाम का लिया जाता था और आज भी वही हो रहा है। मुस्लिम खुद ही आपस में राजनीतिक सत्ता के लिए लड़ रहे थे,लेकिन अब पश्चिमी देश आग में पेट्रोल डाल रहे हैं। तालिबान और आईएसआईएस कैसे अस्तित्व में आए,किसने उनकी मदद की,किसने उन्हें धन और हथियार दिए,यह सभी को पता है सोचना यह है कि अमेरिका और यूरोप की इतनी बमबारी के बाद,इतने युद्ध और इतनी सावधानी के बाद,आतंकवाद समाप्त होने का नाम क्यों नहीं ले रही है?आइएसआइएस और तालिबान की दिन प्रति दिन बढ़ते ताकत का मतलब यह है कि कोई ऐसा व्यक्ति है जो उन्हें घातक हथियार प्रदान कर रहा है। जाहिर तौर पर इसके दो उद्देश्य नज़र आते है।एक यह कि मुस्लिम देश एक दूसरे से लड़ते रहे, हथियारों की आपूर्ति जारी रहे, और हथियार बनाने वाले कारखाने 24 घंटे चलती रहें और लाभ बढ़ता रहे।

दुसरे इस्राइल के आस पास रहने वाले देशों को इतना कमज़ोर कर दिया जाए कि वह इस्राइल कि ओर आँख उठा कर भी न देख सकें। एक और दृष्टिकोण है कि अमेरिका और इस्राइल चाहते हैं कि फिलस्तीनी जनता आत्मघाती हमलावर,पत्थरबजी,बमबारी और हड़ताल बंद करें और अरब देश इस्राइल को स्वीकार कर लें तब कहीं समस्या का हल बात चीत के माद्ध्यम से तय होगा । मगर न आत्मघाती हमला समाप्त होगा, न पत्थरबाज़ी, न बमबारी न ही हड़ताल और यह सिलसिला और पचास वर्ष भी चलता रहे गा जिससे दुनिया भर में दहशत और मौत बढ़ते रहेंगे। अच्छा यही है कि अमेरिका और इस्राइल ऐसे शर्त न रखते हुए बात चीत आरम्भ करें और शांति स्थापित करें। कौन जनता है आइएसआइएस में कितने गैर मुस्लिम मुसलमानों के हुलिए में मौजूद हैं और कितने मुसलमान अज्ञानता वश इस में शामिल हो गए हैं। हर हाल में आइएसआइएस और कट्टरपंथी तालिबान का खात्मा आवश्यक हो गया है वरना इन देशों के मुसलमान आराम और चैन से जी नहीं सकते। पश्चिमी देशों में ऐसे बहुत से लोग हैं जो इसका इलाज पेश कर रहे हैं मगर शासक इसे सुनने और मानने के लिए तैयार नहीं हैं। अब आतंकवाद एक ऐसे बीमारी में बदल चुकी है जो ला इलाज है। पश्चिमी देश खरबों डालर खर्च करने के लिए तैयार हैं मगर इसका विश्लेषण करने के लिए तैयार नहीं हैं। जो समस्याएँ बात चीत से और थोड़ा ले दे कर सुलझाए जा सकते हैं उनके लिए खरबों डालर और हजारों जानें गंवा रहे हैं।

12 सितंबर, 2017 स्रोत: रोजनाम मेरा वतन, नई दिल्ली