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गुरुवार दिनांक 26.04.18 को वैसाख शुक्ल एकादशी के उपलक्ष्य में मोहिनी एकादशी का पर्व मनाया जाएगा। इस एकादशी में स्नान करने के लिए कुश व तिल के लेप का प्रयोग करते हैं। इस दिन श्री हरि के मोहिनी स्वरूप के पूजन का विधान है। सीता की खोज करते समय श्री राम ने भी इस व्रत को किया था। श्री कृष्ण ने युधिष्ठिर को मोहिनी एकादशी की कथा कही व यही कथा महर्षि वशिष्ठ ने श्री रामचंद्र जी से कही थी।

 

जिसके अनुसार सरस्वती के तट पर भद्रावती नगरी में चंद्रवंशी राजा "द्युतिमान" के राज्य में धनपाल नामक अत्यंत धर्मालु वैश्य रहता था। धनपाल के पांच पुत्र थे परंतु सबसे छोटा पांचवा पुत्र धृष्टबुद्धि महापापी था। वह पितृ आदि को नहीं मानकर कुकर्मों में लिप्त होकर पिता के धन को नष्ट करता था, इसी कारण धनपाल ने उसे घर से निकाल दिया था। भूख-प्यास से अति दु:खी होकर वो चोरी करने लगा और पकड़ा गया। राजा ने उसे नगर निकाला दे दिया। वह वन में बहेलिया बनकर पशु-पक्षियों को मार-मारकर खाने लगा। एक दिन भूख-प्यास से व्यथित होकर घूमता हुआ कौडिन्य ऋषि के आश्रम में पहुंचा, जहां ऋषि गंगा में स्नान कर आ रहे थे। ऋषि के भीगे वस्त्रों के छींटे उस पर पड़ने से उसे सद्‍बुद्धि प्राप्त हुई।

 

उसने कौडिन्य से हाथ जोड़कर अपने पापों से मुक्ति का उपाय पूछा जिस पर ऋषि ने उसे मोहिनी एकादशी का विधिवत व्रत करने का आदेश दिया। धृष्टबुद्धि ने ऋषि के निर्देश का पालन किया जिससे उसके सब पाप नष्ट हो गए। मोहिनी एकादशी के विधिवत पूजन, व्रत व उपाय से निंदित कर्मों से छुटकारा मिलता है, मोह बंधन से मुक्ति मिलती है, एक हजार गौदान का फल प्राप्त होता है। पैसे की कमी दूर होती है, पारिवारिक कलह से मुक्ति मिलती है व रोजगार में वृद्धि होती है। 

 

पूजन विधि: घर के ईशान कोण में पीले कपड़े पर पीतल के कलश में जल और पीपल के 11 पत्ते रखकर उस पर श्रीराम का चित्र स्थापित कर विधिवत पूजन करें। गाय के घी में हल्दी मिलाकर दीप जलाएं, चंदन से धूप करें, पीले फूल चढ़ाएं, केसर से तिलक करें व 11 केले का भोग लगाएं तथा किसी माला से इस विशेष मंत्र का 1 माला जाप करें। पूजन के बाद केले पीली आभा लिए गाय को खिला दें।

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